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प्रिंसेप की जयंती पर धम्मलिपि के पाठोद्घाटन का स्मरण

ब्राह्मी लिपि के रहस्योद्घाटन से अशोक के अभिलेखों और बौद्ध इतिहास के पुनर्निर्माण तक प्रिंसेप के योगदान को किया गया रेखांकित

लखनऊ, 20 अगस्त 2026। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर में आज महान विद्वान, पुरातत्त्ववेत्ता, वास्तुविद्, मुद्राशास्त्री तथा प्राचीन भारतीय अभिलेखों के अध्येता जेम्स प्रिंसेप की जयंती श्रद्धापूर्वक मनाई गई। कार्यक्रम में विभिन्न वक्ताओं ने प्रिंसेप के बहुआयामी विद्वत् योगदान को स्मरण करते हुए विशेष रूप से प्राचीन धम्म लिपि के पाठोद्घाटन, सम्राट अशोक के अभिलेखों के अध्ययन तथा बौद्ध इतिहास के पुनर्निर्माण में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।

कार्यक्रम में डॉ. प्रफुल्ल गड़पाल ने कहा कि उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत के प्राचीन अभिलेखों को समझना एक अत्यन्त कठिन चुनौती थी। अनेक शिलालेखों और स्तम्भलेखों के अक्षर विद्वानों के लिए अबूझ थे। ऐसे समय में जेम्स प्रिंसेप ने उपलब्ध अभिलेखीय सामग्री, सिक्कों तथा विभिन्न स्थानों से प्राप्त लेखों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए प्राचीन ब्राह्मी, जिसे धम्मलिपि के नाम से भी जाना जाता है, के रहस्य को समझने की दिशा में निर्णायक कार्य किया। वर्ष 1837 में ब्राह्मी लिपि के पाठोद्घाटन ने भारतीय इतिहास के अध्ययन को एक नई दिशा प्रदान की। उनके कार्य से उन अभिलेखों को पढ़ना सम्भव हुआ, जिनमें प्राचीन भारत के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास के महत्त्वपूर्ण प्रमाण सुरक्षित थे।

उन्होंने कहा कि प्रिंसेप का योगदान केवल किसी प्राचीन लिपि को पढ़ लेने तक सीमित नहीं था। उनके द्वारा अभिलेखों के अध्ययन ने सम्राट अशोक के व्यक्तित्व और उनके धम्म-विषयक विचारों को ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर समझने का मार्ग प्रशस्त किया। अशोक के अनेक अभिलेखों में प्रयुक्त ‘देवानं पिय पियदसि’ जैसे पदों की पहचान तथा अभिलेखीय सामग्री के क्रमिक अध्ययन ने आगे चलकर अशोक के ऐतिहासिक व्यक्तित्व को स्पष्ट करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. गड़पाल ने इस अवसर पर विद्यार्थियों एवं अध्येताओं के लिए धम्मलिपि/ब्राह्मी लिपि के प्रशिक्षण की भावी योजना की भी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन माध्यम से इस प्रकार का प्रशिक्षण आरम्भ किए जाने का प्रयास किया जाएगा, जिससे अधिकाधिक विद्यार्थी एवं शोधार्थी प्राचीन अभिलेखों को मूल लिपि में पढ़ने की दिशा में आगे बढ़ सकें।

विभिन्न अध्येताओं ने रेखांकित किए प्रिंसेप के योगदान

इस अवसर पर श्री राम निहोरे ने जेम्स प्रिंसेप के कार्य को भारतीय इतिहास और पुरातत्त्व के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि प्राचीन भारत के इतिहास के अनेक ऐसे अध्याय, जो लंबे समय तक अभिलेखीय प्रमाणों के अभाव में अस्पष्ट थे, ब्राह्मी लिपि के पाठोद्घाटन के बाद अधिक स्पष्ट होकर सामने आए। उन्होंने कहा कि प्रिंसेप ने भारतीय पुरालेखीय अध्ययन के लिए ऐसी आधारभूमि तैयार की, जिसका प्रभाव आज भी दिखाई देता है।

श्री आर. सी. बौद्ध ने प्रिंसेप के कार्य को बौद्ध अध्ययन की दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि अशोक के शिलालेखों के पाठोद्घाटन के बाद बौद्ध इतिहास के अध्ययन को प्रत्यक्ष अभिलेखीय साक्ष्यों का एक महत्त्वपूर्ण आधार प्राप्त हुआ। अशोक के धम्म, प्रजा के प्रति उनके दृष्टिकोण, नैतिक जीवन तथा धार्मिक सहिष्णुता से सम्बन्धित अभिलेखीय सामग्री ने बौद्ध इतिहास को समझने के लिए नए आयाम प्रस्तुत किए।

श्री आर एस अहिरवार ने कहा कि प्रिंसेप का योगदान भारतीय ज्ञान-परम्परा के पुनर्पाठ की दृष्टि से भी उल्लेखनीय है। उनके प्रयासों से यह सम्भव हुआ कि भारत के विभिन्न भागों में उपलब्ध प्राचीन अभिलेखों को केवल पुरानी लिखावट के रूप में न देखकर ऐतिहासिक स्रोत के रूप में पढ़ा और समझा जा सके। उन्होंने वर्तमान पीढ़ी को प्राचीन लिपियों और अभिलेखों के अध्ययन के प्रति अधिक जागरूक होने की आवश्यकता पर बल दिया। इस अवसर पर उन्होंने एक संक्षिप्त कविता के माध्यम से जेम्स प्रिंसेप को श्रद्धांजलि भी अर्पित की।

श्री विक्रमलाल सत्यार्थी ने प्रिंसेप की शोध-पद्धति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सामग्री का तुलनात्मक अध्ययन कर निष्कर्ष तक पहुँचने का प्रयास किया। सिक्कों, अभिलेखों और अक्षर-रूपों के तुलनात्मक अध्ययन ने भारतीय पुरालेख-विज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करने में सहायता की। उन्होंने कहा कि प्रिंसेप की कार्यपद्धति आज के शोधार्थियों के लिए भी अनुकरणीय है।

श्री सुजल गौतम ने जेम्स प्रिंसेप के योगदान को वर्तमान समय से जोड़ते हुए कहा कि ब्राह्मी लिपि और अशोक के अभिलेख केवल अतीत की वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और बौद्ध धम्म की समझ के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि इन स्रोतों का अध्ययन वर्तमान पीढ़ी को अपनी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

कार्यक्रम के दौरान इस बात पर विशेष बल दिया गया कि ब्राह्मी लिपि के अध्ययन को केवल इतिहास अथवा पुरातत्त्व तक सीमित न रखकर बौद्ध अध्ययन, पालि, संस्कृत, भारतीय दर्शन और प्राचीन भारतीय संस्कृति के विद्यार्थियों से भी जोड़ा जाना चाहिए। इसी क्रम में ऑनलाइन माध्यम से धम्मलिपि/ब्राह्मी लिपि के प्रशिक्षण कार्यक्रम आरम्भ करने का विचार प्रस्तुत किया गया, ताकि परिसर के विद्यार्थियों के साथ-साथ अन्य इच्छुक विद्यार्थी और अध्येता भी इससे लाभान्वित हो सकें। प्रस्तावित प्रशिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों को ब्राह्मी अक्षरों की पहचान, अभिलेख-पाठ, लिप्यन्तरण तथा अशोककालीन अभिलेखों के अध्ययन की प्रारम्भिक जानकारी प्रदान की जाएगी।

वक्ताओं ने इस तथ्य की ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि आधुनिक डिजिटल युग में प्राचीन लिपियों के अध्ययन के लिए ऑनलाइन संसाधनों का उपयोग व्यापक स्तर पर किया जा सकता है। यदि विद्यार्थियों को ब्राह्मी लिपि पढ़ने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए, तो वे अशोक के शिलालेखों तथा अन्य प्राचीन अभिलेखीय स्रोतों का मूल रूप से अध्ययन करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

कार्यक्रम का संचालन सुश्री रुचि ने किया। उन्होंने जेम्स प्रिंसेप के जीवन एवं कार्य से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों को कार्यक्रम की रूपरेखा से जोड़ते हुए सभी वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. जयवंत खंडारे ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए सभी वक्ताओं, आयोजकों, विद्यार्थियों एवं उपस्थित प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

कार्यक्रम में प्रस्तुत विचारों का समग्र निष्कर्ष यही रहा कि जेम्स प्रिंसेप का योगदान भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है। ब्राह्मी लिपि के पाठोद्घाटन ने प्राचीन भारत की अभिलेखीय परम्परा को आधुनिक इतिहास-बोध से जोड़ने का कार्य किया और विशेष रूप से सम्राट अशोक तथा उनके धम्म से सम्बन्धित ऐतिहासिक स्रोतों को समझने के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया। उनकी जयंती का आयोजन न केवल एक महान अध्येता के प्रति श्रद्धांजलि है, बल्कि प्राचीन भारतीय लिपियों, अभिलेखों और बौद्ध विरासत के पुनर्पाठ के प्रति नई पीढ़ी को प्रेरित करने का अवसर भी है।

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