लेखक : डॉ. जितेन्द्र पासवान
भारत में आरक्षण की बहस अक्सर सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों तक सीमित दिखाई देती है। लेकिन बदलती अर्थव्यवस्था में एक बड़ा सवाल यह है कि जब रोजगार और पूंजी का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र में है, तब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आर्थिक भागीदारी किस प्रकार सुनिश्चित होगी?
भारत के शीर्ष 10 राज्य जहाँ सबसे अधिक फैक्ट्रियां हैं
दलित इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अनुसार, उसके क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा संबंधित राज्यों के उद्योग निदेशालय एवं राज्य स्तरीय बैंकर्स कमिटी से मांगी गई सूचना के आधार पर इन राज्यों में फैक्ट्रियों की संख्या निम्नलिखित है:
| क्रमांक | राज्य | फैक्ट्रियों की संख्या |
|---|---|---|
| 1 | तमिलनाडु | 40,121 |
| 2 | गुजरात | 33,311 |
| 3 | महाराष्ट्र | 26,539 |
| 4 | उत्तर प्रदेश | 22,141 |
| 5 | आंध्र प्रदेश | 16,011 |
| 6 | कर्नाटक | 14,984 |
| 7 | तेलंगाना | 13,446 |
| 8 | पंजाब | 13,166 |
| 9 | राजस्थान | 10,868 |
| 10 | हरियाणा | 10,389 |
स्रोत/आधार: दलित इंडस्ट्रीज एसोसिएशन द्वारा अपने क्षेत्रीय कार्यालयों के माध्यम से संबंधित राज्य के उद्योग निदेशालय एवं राज्य स्तरीय बैंकर्स कमिटी से मांगी गई सूचना।
नोट: उपरोक्त आंकड़े एसोसिएशन द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के रूप में प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
इन आंकड़ों को केवल फैक्ट्रियों की संख्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। असली प्रश्न यह है कि इन उद्योगों के स्वामित्व, प्रबंधन और उच्च आय वाले रोजगारों में SC-ST की हिस्सेदारी कितनी है?
एसोसिएशन द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, लगभग 98% मालिक वैश्य, सवर्ण और माइनॉरिटी वर्गों से संबंधित हैं। लगभग 99% क्लास-1 पदाधिकारी भी इन्हीं वर्गों से बताए गए हैं। वहीं लगभग 83% क्लास-2 एवं क्लास-3 पदाधिकारी/कर्मचारी वैश्य, सवर्ण, OBC और माइनॉरिटी वर्गों से संबंधित बताए गए हैं। दूसरी ओर, लगभग 87% चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी एवं मजदूर SC-ST वर्ग से संबंधित बताए गए हैं।
यदि ये आंकड़े व्यापक औद्योगिक वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो यह केवल रोजगार का प्रश्न नहीं है, बल्कि आर्थिक शक्ति, उद्योग के स्वामित्व और अवसरों के असमान वितरण का प्रश्न है।
आखिर SC-ST को प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण कहाँ चाहिए?
इस प्रश्न का उत्तर केवल यह नहीं हो सकता कि निजी कंपनियों में कुछ प्रतिशत नौकरियां आरक्षित कर दी जाएं। सवाल इससे कहीं बड़ा है।
क्या SC-ST समाज को हमेशा किसी दूसरे के उद्योग में कर्मचारी और मजदूर बनकर रहना चाहिए?
या ऐसी नीतियां बनाई जानी चाहिए जिनसे SC-ST का युवा कंपनी का मालिक, उद्यमी, ठेकेदार, सप्लायर, निर्माता और निवेशक भी बन सके?
मेरे विचार से वास्तविक आर्थिक सशक्तीकरण का अर्थ केवल नौकरी में स्थान सुरक्षित करना नहीं, बल्कि उद्योग-व्यापार में प्रवेश और स्वामित्व के अवसर सुनिश्चित करना भी होना चाहिए।
मजदूर से मालिक बनने की दिशा
एक SC-ST युवा जब अपनी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाकर फैक्ट्री स्थापित करता है, तो वह केवल अपना रोजगार नहीं बनाता। वह दूसरों को भी रोजगार देने की क्षमता पैदा करता है, उत्पादन करता है, टैक्स देता है और अर्थव्यवस्था में पूंजी निर्माण का भागीदार बनता है।
इसलिए SC-ST समाज के युवाओं के सामने केवल यह विकल्प नहीं होना चाहिए कि वे किसी दूसरे की फैक्ट्री में नौकरी करें या मजदूरी करें।
विकल्प यह भी होना चाहिए कि वे अपनी कंपनी स्थापित करें, फैक्ट्री लगाएं और स्वयं नियोक्ता बनें।
उद्योगों में भागीदारी कैसे बढ़े?
SC-ST उद्यमियों को आगे बढ़ाने के लिए केवल सरकारी नौकरी के आरक्षण पर निर्भर रहने के बजाय निम्न क्षेत्रों में विशेष अवसर और सहयोग आवश्यक है—
- आसान और पर्याप्त बैंक ऋण
- क्रेडिट गारंटी और ब्याज में सहायता
- औद्योगिक भूखंड एवं आधारभूत सुविधाओं तक पहुंच
- आधुनिक तकनीक और कौशल प्रशिक्षण
- सरकारी खरीद में अवसर
- बड़े उद्योगों की सप्लाई चेन में SC-ST उद्यमियों की भागीदारी
- Vendor Development Programme
- बाजार एवं निर्यात से जोड़ने की व्यवस्था
- नए उद्यमियों के लिए मेंटरशिप और तकनीकी सहायता
- SC-ST उद्यमियों के लिए निवेश और पूंजी जुटाने के बेहतर अवसर
असली सवाल प्रतिनिधित्व का है
इसलिए निजी क्षेत्र में SC-ST की चर्चा केवल “आरक्षण चाहिए या नहीं चाहिए” तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
असल सवाल यह है—
उद्योगों में SC-ST का स्वामित्व कितना है?
कंपनियों के बोर्ड और प्रबंधन में उनकी भागीदारी कितनी है?
सरकारी और कॉरपोरेट खरीद में SC-ST उद्यमियों की हिस्सेदारी कितनी है?
बैंक ऋण और निवेश तक उनकी पहुंच कितनी है?
बड़े उद्योगों की सप्लाई चेन में SC-ST कंपनियां कितनी हैं?
जब तक इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार नहीं होगा, तब तक आर्थिक समानता की चर्चा अधूरी रहेगी।
2016 से उद्योग और व्यापार की दिशा में प्रयास
दलित इंडस्ट्रीज एसोसिएशन अपनी स्थापना वर्ष 2016 से SC-ST समाज को उद्योग, वाणिज्य एवं व्यापार से जोड़ने का प्रयास कर रही है।
इस प्रयास की मूल भावना यही है कि SC-ST समाज केवल श्रम शक्ति बनकर न रहे, बल्कि उत्पादन, उद्यमिता, पूंजी निर्माण और उद्योग के स्वामित्व में भी अपनी मजबूत भागीदारी सुनिश्चित करे।
हमें अपने युवाओं में यह विश्वास पैदा करना होगा कि उनकी मंजिल केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं है। वे उद्यमी भी बन सकते हैं, उद्योगपति भी बन सकते हैं और सैकड़ों-हजारों लोगों को रोजगार देने वाले नियोक्ता भी बन सकते हैं।
निजी क्षेत्र में SC-ST को केवल आरक्षण की आवश्यकता के प्रश्न तक सीमित करना उचित नहीं होगा। आवश्यकता है आर्थिक हिस्सेदारी, अवसर की समानता और उद्योग के स्वामित्व की।
भारत यदि समावेशी और मजबूत अर्थव्यवस्था बनना चाहता है, तो SC-ST समाज की भागीदारी केवल श्रम तक सीमित नहीं रह सकती। उन्हें उद्योग के स्वामित्व, प्रबंधन, पूंजी, उत्पादन और बाजार में भी पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
क्योंकि सामाजिक न्याय की अंतिम मंजिल केवल नौकरी नहीं—आर्थिक स्वावलंबन, उद्यमिता और स्वामित्व है।
सवाल यही है—SC-ST समाज दूसरों की फैक्ट्रियों में हमेशा मजदूर बनेगा, या अपनी फैक्ट्री लगाकर मालिक और रोजगारदाता भी बनेगा?



