— डॉ. जितेन्द्र पासवान
भारत की अर्थव्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ विकास का केंद्र केवल पारंपरिक उद्योग या सरकारी रोजगार नहीं रह गया है। आज अंतरिक्ष (स्पेस), रक्षा उत्पादन, परमाणु ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, ड्रोन, क्वांटम कंप्यूटिंग और डिजिटल विनिर्माण जैसे रणनीतिक क्षेत्र भारत की नई आर्थिक शक्ति बनकर उभर रहे हैं। यह परिवर्तन केवल औद्योगिक बदलाव नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक नेतृत्व के पुनर्गठन का संकेत भी है।
ऐसे समय में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC-ST) समाज के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या हम इस नई औद्योगिक क्रांति में केवल दर्शक बने रहेंगे, या इसके निर्माता और भागीदार बनेंगे?
बदलती औद्योगिक नीति ने खोले नए अवसर
पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने उन क्षेत्रों को भी निजी निवेश के लिए खोलना शुरू किया है, जिन्हें पहले केवल सरकारी नियंत्रण वाला माना जाता था। अंतरिक्ष क्षेत्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
हैदराबाद की निजी कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित विक्रम-1 रॉकेट की सफलता ने यह सिद्ध कर दिया है कि अब भारत में निजी कंपनियाँ भी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं। सैटेलाइट प्रक्षेपण, स्पेस कम्युनिकेशन, पृथ्वी अवलोकन, सैटेलाइट इंटरनेट और पुनः उपयोग योग्य रॉकेट जैसी तकनीकों में विशाल व्यावसायिक संभावनाएँ मौजूद हैं।
इसी प्रकार रक्षा उत्पादन में स्थानीय निर्माण को बढ़ावा देने वाली नीतियों ने निजी उद्योगों के लिए नए द्वार खोले हैं। आज अनेक भारतीय कंपनियाँ आधुनिक रक्षा उपकरण, ड्रोन, मिसाइलों के पुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और रक्षा तकनीक के निर्माण में सक्रिय हैं।
परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भी निजी निवेश को प्रोत्साहित करने की दिशा में नीतिगत बदलाव किए जा रहे हैं। इससे भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ उच्च तकनीकी उद्योगों का भी विस्तार होगा।
अब संघर्ष केवल आरक्षण का नहीं, आर्थिक नेतृत्व का है
SC-ST समाज ने शिक्षा, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की लड़ाई में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। लेकिन 21वीं सदी की वास्तविक प्रतिस्पर्धा केवल नौकरियों की नहीं, बल्कि पूँजी, उद्योग, तकनीक और नवाचार की है।
जो समाज उद्योग स्थापित करेगा, तकनीक विकसित करेगा, स्टार्टअप बनाएगा और वैश्विक बाज़ार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा, वही भविष्य की आर्थिक और सामाजिक दिशा तय करेगा।
इसलिए अब आवश्यकता केवल नौकरी प्राप्त करने की नहीं, बल्कि रोज़गार देने वाला समाज बनने की है।
नई पीढ़ी के लिए पाँच प्रमुख लक्ष्य
यदि SC-ST समाज आर्थिक क्रांति का नेतृत्व करना चाहता है, तो उसे निम्नलिखित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा—
- विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) शिक्षा में अधिक भागीदारी।
- स्टार्टअप, नवाचार और अनुसंधान आधारित उद्यमों की स्थापना।
- रक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, AI और डिजिटल तकनीकों में विशेषज्ञता।
- औद्योगिक क्लस्टर, एमएसएमई और विनिर्माण इकाइयों में निवेश।
- सरकारी योजनाओं, स्टैंड-अप इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मुद्रा, वेंचर कैपिटल और CSR संसाधनों का अधिकतम उपयोग।
सामाजिक संगठनों की भी बदलनी होगी भूमिका
आज आवश्यकता केवल सामाजिक सम्मेलन, सम्मान समारोह या सांस्कृतिक कार्यक्रमों की नहीं है। समाज के संगठनों को टेक्नोलॉजी इनक्यूबेशन सेंटर, स्टार्टअप सहायता केंद्र, कौशल विकास संस्थान, उद्योग परामर्श मंच और निवेश मार्गदर्शन केंद्र स्थापित करने होंगे।
युवाओं को यह बताया जाना चाहिए कि भविष्य का भारत केवल डिग्री से नहीं, बल्कि नवाचार, तकनीकी दक्षता और उद्यमिता से संचालित होगा।
आर्थिक शक्ति ही सामाजिक सम्मान का आधार बनेगी
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने शिक्षा, संगठन और संघर्ष का जो मार्ग बताया था, आज उसी का अगला चरण आर्थिक आत्मनिर्भरता और औद्योगिक नेतृत्व है। सामाजिक सम्मान तभी स्थायी होगा जब समाज आर्थिक रूप से भी मजबूत होगा। उद्योग, पूँजी, तकनीक और ज्ञान पर अधिकार ही वास्तविक सशक्तिकरण का आधार है।
भारत की नई औद्योगिक नीति स्पष्ट संकेत दे रही है कि आने वाला दशक उच्च प्रौद्योगिकी, रणनीतिक उद्योगों और नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था का दशक होगा। SC-ST समाज के युवाओं के सामने यह ऐतिहासिक अवसर है कि वे केवल रोजगार पाने वाले नहीं, बल्कि उद्योग स्थापित करने वाले, तकनीक विकसित करने वाले और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को दिशा देने वाले उद्यमी बनें।
यदि समाज समय रहते इस परिवर्तन को समझकर शिक्षा, तकनीक, अनुसंधान, उद्योग और पूँजी निर्माण की दिशा में संगठित प्रयास करता है, तो आने वाली पीढ़ियाँ इस दौर को “SC-ST आर्थिक क्रांति का स्वर्णिम काल” कहेंगी।
(लेखक: डॉ. जितेन्द्र पासवान, सामाजिक चिंतक एवं SC-ST आर्थिक क्रांति अभियान से जुड़े विचारक। लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)

