लेखक : डॉ. जितेन्द्र पासवान
भारत की अर्थव्यवस्था में वर्ष 1991 एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया। आर्थिक संकट से जूझ रहे देश ने उस दौर में ऐसे आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा बदल दी। इसे हम उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के दौर की शुरुआत के रूप में जानते हैं।
लेकिन आज भी सवाल यह है कि क्या उदारीकरण का अर्थ आम नागरिक समझता है? शायद नहीं। बहुत से लोग उदारीकरण को केवल बड़ी कंपनियों, विदेशी निवेश या बाजार खोलने की नीति मानते हैं, जबकि इसका व्यापक अर्थ आर्थिक अवसरों, प्रतिस्पर्धा, उद्यमिता और व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता से भी जुड़ा है।
1991 का संकट और आर्थिक सुधारों की शुरुआत
1991 में भारत गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से गुजर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि वह लगभग कुछ सप्ताह के आयात के बराबर रह गया था। राजकोषीय घाटा और भुगतान संतुलन की समस्या लगातार बढ़ रही थी।
इसी कठिन दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई। भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर सी. रंगराजन भी उस टीम के महत्वपूर्ण सदस्य थे।
जुलाई 1991 में रुपये का दो चरणों में अवमूल्यन किया गया। इसके साथ ही औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था में व्यापक बदलाव, आयात-निर्यात नीति में सुधार और अर्थव्यवस्था में सरकारी नियंत्रण कम करने की दिशा में कदम उठाए गए।
सी. रंगराजन के अनुसार, उस समय रुपये के अवमूल्यन का निर्णय परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए आवश्यक था। उनके मुताबिक सुधार कोई एक बार होने वाली घटना नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।
लाइसेंस-परमिट राज से बाजार की ओर
1991 से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था में सरकारी नियंत्रण काफी व्यापक था। उद्योग लगाने से लेकर उत्पादन बढ़ाने और कई प्रकार की आर्थिक गतिविधियों तक के लिए लाइसेंस और परमिट की आवश्यकता होती थी।
आर्थिक सुधारों ने इस व्यवस्था को धीरे-धीरे बदलना शुरू किया।
उदारीकरण का मूल उद्देश्य था—सरकारी नियंत्रण को कम करना, प्रतिस्पर्धा बढ़ाना, निजी क्षेत्र को अवसर देना और भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ना।
इस परिवर्तन से व्यापार, उद्योग, बैंकिंग, दूरसंचार, सेवा क्षेत्र और रोजगार के नए अवसरों का विस्तार हुआ।
एससी-एसटी समाज के लिए उदारीकरण का मतलब क्या है?
यह प्रश्न विशेष महत्व रखता है।
एससी-एसटी समाज की आर्थिक स्थिति को केवल सरकारी योजनाओं या आरक्षण के चश्मे से देखने के बजाय आर्थिक अवसरों और उद्यमिता के नजरिए से भी देखना होगा।
उदारीकरण का सबसे बड़ा संदेश है—अवसर केवल नौकरी में नहीं, बाजार में भी हैं।
आज एक व्यक्ति छोटा व्यवसाय शुरू कर सकता है, डिजिटल माध्यम से देशभर में अपना उत्पाद बेच सकता है, ई-कॉमर्स से जुड़ सकता है, सेवा क्षेत्र में काम कर सकता है, स्टार्टअप शुरू कर सकता है और बैंकिंग तथा वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेकर अपना उद्यम खड़ा कर सकता है।
एससी-एसटी समाज के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए यह समझना जरूरी है कि सरकारी सहायता अवसर का दरवाजा खोल सकती है, लेकिन उस अवसर को आर्थिक शक्ति में बदलने के लिए कौशल, उद्यमिता, पूंजी, बाजार की समझ और जोखिम उठाने की क्षमता भी जरूरी है।
उदारीकरण से दूरी नहीं, अवसरों से जुड़ाव जरूरी
किसी भी समाज की आर्थिक प्रगति केवल सरकारी सहायता से संभव नहीं होती। इसके लिए शिक्षा के साथ-साथ कौशल, पूंजी, उद्यमिता और बाजार से जुड़ाव आवश्यक है।
यदि कोई व्यक्ति बदलती अर्थव्यवस्था को नहीं समझता, डिजिटल अर्थव्यवस्था से नहीं जुड़ता, बाजार की जरूरतों को नहीं पहचानता और केवल पारंपरिक रोजगार के विकल्पों तक सीमित रहता है, तो उसके आर्थिक अवसर भी सीमित हो सकते हैं।
इसलिए एससी-एसटी समाज सहित समाज के प्रत्येक वंचित वर्ग को उदारीकरण के व्यावहारिक पक्ष को समझने की जरूरत है।
उदारीकरण का अर्थ केवल बड़े उद्योगपतियों के लिए बाजार खोलना नहीं है; इसका अर्थ छोटे उद्यमी के लिए भी नए बाजार और नए अवसर पैदा होना है।
आर्थिक क्रांति की अगली मंजिल—उद्यमिता
आज भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप, ई-कॉमर्स, सेवा क्षेत्र, विनिर्माण और कौशल आधारित रोजगार के नए दौर में प्रवेश कर चुका है।
ऐसे में एससी-एसटी युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला बनने की दिशा में भी सोचना होगा।
इसके लिए तीन चीजें बेहद महत्वपूर्ण हैं—
पहली—कौशल।
जिस क्षेत्र में बाजार की मांग है, उसमें आधुनिक कौशल हासिल करना।
दूसरी—उद्यमिता।
छोटे स्तर से व्यवसाय शुरू करके उसे धीरे-धीरे बढ़ाना।
तीसरी—बाजार से जुड़ाव।
अपने उत्पाद और सेवाओं को स्थानीय बाजार से निकालकर डिजिटल और राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना।
उदारीकरण को समझना ही असली आर्थिक सशक्तीकरण है
1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत को यह संदेश दिया कि अर्थव्यवस्था को बंद रखकर विकास की गति सीमित हो सकती है। प्रतिस्पर्धा, नवाचार, निवेश और बाजार से जुड़ाव आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण आधार हैं।
आज आवश्यकता है कि उदारीकरण की इस अवधारणा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जाए।
एससी-एसटी समाज के आर्थिक सशक्तीकरण की अगली लड़ाई केवल आरक्षण और सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रह सकती। इसमें शिक्षा, कौशल, उद्यमिता, वित्तीय साक्षरता, डिजिटल तकनीक और बाजार तक पहुंच को भी शामिल करना होगा।
क्योंकि आर्थिक आजादी का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब व्यक्ति अवसर को पहचानने, उसे हासिल करने और उसे आर्थिक शक्ति में बदलने में सक्षम हो।
1991 का उदारीकरण भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास का एक निर्णायक अध्याय था। उस दौर में शुरू हुए सुधार आज भी निरंतर विकसित हो रहे हैं।
इसलिए आज की जरूरत उदारीकरण से दूरी बनाने की नहीं, बल्कि उसकी संभावनाओं को समझने और समाज के वंचित वर्गों तक पहुंचाने की है।
जिस समाज के लोग बाजार, तकनीक, पूंजी और उद्यमिता के अवसरों से जुड़ेंगे, उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। और यही एससी-एसटी समाज की आर्थिक क्रांति की अगली दिशा हो सकती है


