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टिशू कल्चर खेती स्टार्टअप: खेत से लैब तक नई कृषि क्रांति

कम जमीन में अधिक उत्पादन, रोग-मुक्त पौधों की बढ़ती मांग से युवाओं के लिए खुल रहे करोड़ों के अवसर

राष्ट्रीय पंचायत विशेष लेख-

नई दिल्ली/पटना। भारतीय कृषि तेजी से पारंपरिक खेती से आधुनिक, तकनीक आधारित कृषि की ओर बढ़ रही है। इसी बदलाव में टिशू कल्चर तकनीक किसानों, युवाओं और कृषि उद्यमियों के लिए बड़ा अवसर बनकर उभर रही है। एक स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण पौधे से प्रयोगशाला में बड़ी संख्या में एक जैसे तथा रोग-मुक्त पौधे तैयार किए जा सकते हैं। यही कारण है कि केला, बांस, आलू, गन्ना, स्ट्रॉबेरी, अनार, सागवान और औषधीय पौधों जैसी फसलों में टिशू कल्चर पौधों की मांग तेजी से बढ़ रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक बागवानी में गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री उत्पादन सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक है। यदि किसान को शुरुआत में ही स्वस्थ और प्रमाणित पौधा मिल जाए तो उत्पादन, पौधों की एकरूपता और खेती की सफलता की संभावना बढ़ जाती है।

क्या है टिशू कल्चर?

टिशू कल्चर यानी Plant Tissue Culture ऐसी वैज्ञानिक तकनीक है, जिसमें पौधे के स्वस्थ ऊतक या छोटे हिस्से को नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में विकसित करके नए पौधे तैयार किए जाते हैं। उचित प्रक्रिया के माध्यम से एक चयनित पौधे से बड़ी संख्या में पौधे तैयार किए जा सकते हैं।

पारंपरिक बीज या कलम से तैयार पौधों की तुलना में टिशू कल्चर का सबसे बड़ा आकर्षण है—एकरूपता, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री और बड़े पैमाने पर पौध उत्पादन की क्षमता।

खासकर केले की G9 जैसी लोकप्रिय किस्मों में इसका व्यापक व्यावसायिक उपयोग देखने को मिलता है।

कौन-कौन सी फसलें सबसे ज्यादा संभावनाशील?

राष्ट्रीय स्तर पर टिशू कल्चर आधारित कारोबार के लिए कई फसलों में अवसर हैं। इनमें प्रमुख हैं—

  • केला G9 – बड़े पैमाने पर मांग वाली फसल
  • आलू और गन्ना – गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री के लिए अवसर
  • बांस – निर्माण, फर्नीचर और औद्योगिक उपयोग के कारण संभावनाशील
  • स्ट्रॉबेरी और अनार – उच्च मूल्य वाली बागवानी
  • सागवान – दीर्घकालीन पौध उत्पादन का बाजार
  • औषधीय पौधे – अश्वगंधा, सफेद मूसली आदि

इस क्षेत्र में केवल पौधे तैयार करना ही कारोबार नहीं है। लैब, हार्डनिंग यूनिट, नर्सरी, प्रशिक्षण, किसान नेटवर्क और डिजिटल बिक्री को जोड़कर पूरा बिजनेस मॉडल तैयार किया जा सकता है।

DIA के लिए तीन-स्तरीय बिजनेस मॉडल

इस क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए एक साथ बड़ी लैब लगाने की जरूरत नहीं है। चरणबद्ध मॉडल अपनाकर छोटे स्तर से शुरुआत की जा सकती है।

लेवल-1 : Hardening Unit—जिला स्तर

यह सबसे कम निवेश वाला मॉडल हो सकता है। प्रमाणित टिशू कल्चर लैब से छोटे पौधे लेकर उन्हें पॉलीहाउस/ग्रीनहाउस की नियंत्रित परिस्थितियों में विकसित किया जाता है। जब पौधे खेत में लगाने योग्य हो जाते हैं तो उन्हें किसानों को उपलब्ध कराया जा सकता है।

यह मॉडल उन युवाओं के लिए उपयोगी हो सकता है जो सीधे लैब स्थापित करने के बजाय नर्सरी और पौध वितरण कारोबार से शुरुआत करना चाहते हैं।

लेवल-2 : Small Tissue Culture Lab—राज्य स्तर

दूसरे चरण में छोटी क्षमता की टिशू कल्चर लैब स्थापित की जा सकती है। शुरुआती कारोबार में केला G9 और बांस जैसी फसलों पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है।

इस मॉडल में लैब के लिए नियंत्रित वातावरण, ऑटोक्लेव, लैमिनार एयर-फ्लो सिस्टम, कल्चर रैक तथा अन्य आवश्यक उपकरणों की जरूरत होती है।

लेवल-3 : Mother Lab—राष्ट्रीय स्तर

तीसरे चरण में बड़े पैमाने की Mother Lab विकसित करने का लक्ष्य रखा जा सकता है। प्रस्तावित मॉडल में एक केंद्रीय लैब से विभिन्न राज्यों में गुणवत्तापूर्ण पौधों की आपूर्ति और राज्य/जिला स्तर पर हार्डनिंग एवं वितरण नेटवर्क विकसित किया जा सकता है।

इससे एक ऐसा नेटवर्क तैयार हो सकता है जिसमें—

Mother Lab → State Lab/Hardening Unit → Nursery → Farmer

तक पूरी सप्लाई चेन विकसित हो।

Backward और Forward Linkage से बनेगा पूरा नेटवर्क

इस स्टार्टअप मॉडल की सफलता केवल पौधे तैयार करने पर निर्भर नहीं होगी। इसके लिए मजबूत सप्लाई चेन आवश्यक है।

Backward Linkage:
Mother Lab से प्रमाणित पौध सामग्री → राज्य स्तर की यूनिट → जिला हार्डनिंग यूनिट

Forward Linkage:
Hardening Unit → किसान → बागवानी परियोजना → बाजार

डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स नेटवर्क के माध्यम से किसानों तक पौधों की पहुंच बढ़ाई जा सकती है। ONDC जैसे डिजिटल कॉमर्स नेटवर्क का उपयोग भी संभावित बिक्री चैनल के रूप में किया जा सकता है, हालांकि संबंधित कृषि उत्पाद की पात्रता और प्लेटफॉर्म की वर्तमान व्यवस्था की पुष्टि आवश्यक होगी।

सरकारी योजनाएं बन सकती हैं वित्तीय आधार

टिशू कल्चर और बागवानी से जुड़े उद्यमों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाएं महत्वपूर्ण हो सकती हैं। इनमें Mission for Integrated Development of Horticulture (MIDH), RKVY से जुड़े स्टार्टअप कार्यक्रम, Agri Clinics and Agri Business Centres (AC&ABC) तथा कृषि स्टार्टअप के लिए उपलब्ध अन्य वित्तीय साधन शामिल हैं।

MIDH/NHM

बागवानी क्षेत्र में संरक्षित खेती, रोपण सामग्री और टिशू कल्चर से संबंधित गतिविधियों के लिए सहायता के प्रावधान हो सकते हैं। सहायता की राशि और पात्रता परियोजना, राज्य और वर्तमान दिशानिर्देशों पर निर्भर करती है। इसलिए आवेदन से पहले जिला उद्यान विभाग से वर्तमान यूनिट कॉस्ट और सब्सिडी नियम की पुष्टि करना जरूरी है।

RKVY-RAFTAAR

कृषि क्षेत्र के स्टार्टअप को शुरुआती चरण में सहायता उपलब्ध कराने के लिए RKVY-RAFTAAR जैसे कार्यक्रम महत्वपूर्ण रहे हैं। आइडिया और सीड स्टेज के लिए सहायता की सीमा संबंधित वर्ष की गाइडलाइन और चयन प्रक्रिया के अनुसार निर्धारित होती है।

AC&ABC योजना

कृषि व्यवसाय स्थापित करने वाले युवाओं के लिए Agri Clinics and Agri Business Centres योजना महत्वपूर्ण विकल्प हो सकती है। कृषि से जुड़े उद्यमों, प्रशिक्षण और व्यवसायिक गतिविधियों के लिए बैंक वित्त तथा संबंधित सहायता का रास्ता इस योजना से खुल सकता है।

AgriSURE

कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के स्टार्टअप को प्रोत्साहित करने के लिए AgriSURE Fund भी एक महत्वपूर्ण पहल है। इसका उद्देश्य कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र में नवाचार और उद्यमिता को पूंजी उपलब्ध कराने वाले इकोसिस्टम को मजबूत करना है।

NCS-TCP: गुणवत्ता की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी

टिशू कल्चर कारोबार में केवल पौध तैयार करना पर्याप्त नहीं है। गुणवत्ता, रोग-मुक्तता और आनुवंशिक शुद्धता सबसे महत्वपूर्ण विषय हैं।

भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग से जुड़ा National Certification System for Tissue Culture Raised Plants (NCS-TCP) टिशू कल्चर से तैयार पौधों की गुणवत्ता प्रमाणन व्यवस्था से संबंधित है।

बड़े व्यावसायिक बाजार में प्रवेश करने वाले उद्यमियों के लिए प्रमाणन और गुणवत्ता मानकों को शुरुआत से ही बिजनेस मॉडल का हिस्सा बनाना चाहिए।

कैसे शुरू करें? सात कदमों का रोडमैप

पहला कदम: अपने राज्य में लागू टिशू कल्चर और बागवानी संबंधी नियमों की जानकारी लें।

दूसरा कदम: मान्यता प्राप्त संस्थान/प्रशिक्षण केंद्र से टिशू कल्चर, हार्डनिंग और नर्सरी प्रबंधन का व्यावहारिक प्रशिक्षण लें।

तीसरा कदम: फसल, क्षमता, बाजार और निवेश के आधार पर विस्तृत DPR (Detailed Project Report) तैयार करें।

चौथा कदम: MIDH/RKVY/AC&ABC/बैंक वित्त आदि में अपनी परियोजना की पात्रता जांचें।

पांचवां कदम: परियोजना के अनुसार लैब या हार्डनिंग यूनिट स्थापित करें।

छठा कदम: गुणवत्तापूर्ण और प्रमाणित स्रोत से Mother Culture/Planting Material प्राप्त करें।

सातवां कदम: हार्डनिंग के बाद किसानों, नर्सरियों और संस्थागत खरीदारों को पौधों की आपूर्ति करें तथा डिजिटल बिक्री चैनलों का विस्तार करें।

DIA की भूमिका: प्रशिक्षण से बाजार तक

दलित इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (DIA) के प्रस्तावित मॉडल में टिशू कल्चर को केवल एक कृषि व्यवसाय के रूप में नहीं बल्कि रोजगार और उद्यमिता के राष्ट्रीय नेटवर्क के रूप में विकसित करने की योजना रखी गई है।

इसके तहत प्रशिक्षण कार्यक्रमों में टिशू कल्चर का विशेष मॉड्यूल जोड़ा जा सकता है। प्रत्येक राज्य में मास्टर ट्रेनर तैयार कर जिला और प्रखंड स्तर पर युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

प्रस्तावित डिजिटल पोर्टल के माध्यम से—

पौध बुकिंग + प्रशिक्षण + प्रमाणपत्र + किसान संपर्क + बिक्री नेटवर्क

को एक प्लेटफॉर्म पर जोड़ने का लक्ष्य रखा जा सकता है।

SC-ST युवाओं के लिए क्यों बड़ा अवसर?

टिशू कल्चर क्षेत्र की खासियत यह है कि इसमें केवल अपनी जमीन होना ही जरूरी नहीं है। उद्यमी लैब, हार्डनिंग यूनिट, नर्सरी, पौध वितरण या डिजिटल एग्री-मार्केटिंग में से किसी एक स्तर से शुरुआत कर सकता है।

यही वजह है कि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के शिक्षित युवाओं के लिए यह एक संभावनाशील कृषि-स्टार्टअप क्षेत्र बन सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात

टिशू कल्चर को केवल “पौधे बनाने की तकनीक” समझना इस अवसर को छोटा करके देखना होगा। असली अवसर है—

लैब + हार्डनिंग + नर्सरी + किसान नेटवर्क + प्रमाणित पौध + डिजिटल मार्केट + प्रशिक्षण

को जोड़कर एक संपूर्ण कृषि उद्यम तैयार करना।

अगर यह मॉडल जिला स्तर पर सफल होता है तो एक जिले से कई युवाओं को रोजगार और उद्यमिता के अवसर मिल सकते हैं। राज्य स्तर पर नेटवर्क बनने के बाद यही मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार पा सकता है।

टिशू कल्चर खेती आने वाले वर्षों में भारतीय बागवानी की महत्वपूर्ण तकनीकों में से एक बन सकती है। जरूरत है—सही प्रशिक्षण, प्रमाणित रोपण सामग्री, वैज्ञानिक प्रबंधन, सरकारी योजनाओं की सही जानकारी और मजबूत बाजार नेटवर्क की।

डॉ. जितेन्द्र पासवान
दलित इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (DIA)
SC-ST युवाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक पहल

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