
नई दिल्ली। देश में आम आदमी की रसोई से लेकर मिठाई और खाद्य उद्योग तक में इस्तेमाल होने वाली चीनी अब अपनी बढ़ती कीमतो के कारण आम जन को ‘कड़वी’ लगने लगी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 20 अगस्त 2026 को चीनी की औसत खुदरा कीमत 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गई। एक महीने पहले यह कीमत 48.18 रुपये और दो माह पूर्व 46.30 रुपये प्रति किलो थी। यानी एक साल में कीमत करीब 20 फीसदी और महज एक महीने में करीब 16 फीसदी बढ़ चुकी है। हालांकि मोदी सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात करने का फैसला किया है। बाज़ार के जानकारों का कहना है कि चीनी के दाम इससे पहले कभी इतने ऊंचे नहीं गए।
केंद्र सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश में गन्ने की बुआई पिछले साल के लगभग बराबर ही हुई है। यह पांच वर्षों के औसत बुआई से क़रीब चार लाख हेक्टेयर ज्यादा है। जन्माष्टमी से शुरू होने वाला त्योहारों का मौसम क़रीब आ रहा है. ऐसे में चीनी की बढ़ती क़ीमतों पर क़ाबू पाने के लिए सरकार ने चीनी के निर्यात पर रोक लगा दी है। साथ ही, थोक व्यापारियों के पास चीनी का कितना स्टॉक हो सकता है, इस पर स्टॉक लिमिट भी लगा दी गई है। साथ ही 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात का फैसला किया है।
चीनी के दाम क्यों बढ़ रहे हैं?
दुनिया में चीनी उत्पादन के मामले में ब्राज़ील के बाद भारत दूसरे नंबर पर है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, देश में गन्ने के रस से चीनी बनाने वाली कुल 703 मिलें हैं. इनमें 335 प्राइवेट, 325 सहकारी और 43 सरकारी चीनी मिलें हैं।
भारत में चीनी का उत्पादन वर्ष अक्टूबर से शुरू होकर अगले साल सितंबर में समाप्त होता है। चीनी मिलों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था नेशनल फेडरेशन ऑफ को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड के उपाध्यक्ष केतन पटेल का कहना है कि 2025-26 के चीनी वर्ष में देश में चीनी उत्पादन 3.2 करोड़ टन (32 अरब किलोग्राम) रहने का अनुमान था, लेकिन वास्तव में यह क़रीब 3 करोड़ टन (30 अरब किलोग्राम) ही रहा।
बातचीत में उन्होंने कहा, पिछले साल बारिश ज्यादा हुई थी। जिसका गन्ने की फसल पर प्रतिकूल असर पड़ा। इसी तरह अधिक उत्पादन देने वाली सीओ-0238 नाम की गन्ने की किस्म में उत्तर प्रदेश में गेरुआ रोग फैल गया। इन दोनों कारणों से गन्ने का उत्पादन और शुगर रिकवरी रेट यानी 100 किलोग्राम गन्ने से मिलने वाली चीनी का प्रतिशत 12 किलोग्राम से नीचे आ गया. इसलिए चीनी का उत्पादन अनुमान से कम रहा। केतन पटेल ने बताया कि भारत में चीनी की खपत 2.6 करोड़ टन से 2.8 करोड़ टन के बीच रहती है और आम तौर पर साल के अंत में 60 से 70 लाख टन चीनी एंडिंग स्टॉक यानी बचा हुआ भंडार के रूप में रह जाती है। उन्होंने बताया, 2024-25 के साल के अंत में एंडिंग स्टॉक केवल 50 से 50.5 लाख टन था। इस तरह 2025-26 की शुरुआत कम ओपनिंग स्टॉक यानी शुरुआती भंडार के साथ हुई और फिर उत्पादन भी अनुमान से थोड़ा कम रहा. कमज़ोर मॉनसून चीनी के उत्पादन को प्रभावित करने वाला अकेला कारण नहीं है। फिर भी ऐसा लगता है कि लोग पैनिक बाइंग यानी क़ीमतें और बढ़ने की आशंका में तेज़ी से ख़रीदारी कर रहे हैं। एक तरफ़ उपलब्ध स्टॉक थोड़ा कम है, त्योहारों का मौसम है और बारिश को लेकर चिंता है. दूसरी तरफ मांग ज्यादा है। नतीजतन क़ीमतें बढ़ गई हैं।
क्या चीनी की कमी है?
देश में निजी चीनी मिलों के संगठन इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईएसएमए) की वेबसाइट के मुताबिक, भारत में कपड़ा उद्योग के बाद गन्ना आधारित उद्योग देश का दूसरा सबसे बड़ा कृषि आधारित उद्योग है। आईएसएमए के मुताबिक़, देश में हर साल औसतन 55 लाख से 60 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती होती है. औसतन 45 करोड़ टन गन्ने का उत्पादन होता है और इससे क़रीब पांच करोड़ लोगों को रोज़गार मिलता है।
28 जुलाई को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में केंद्र सरकार ने दावा किया था कि देश में चीनी की कोई कमी नहीं है। प्रेस विज्ञप्ति में सरकार ने कहा था, ‘सरकार के संज्ञान में आया है कि हाल में मिलों के गेट पर चीनी की क़ीमतों में हुई बढ़ोतरी मौजूदा मांग और आपूर्ति की स्थिति के अनुरूप नहीं है।’
यह भी सामने आया है कि कुछ व्यापारियों, डीलरों और बिचौलियों की जमाखोरी, सट्टेबाजी और मिलों से चीनी की वास्तविक आवाजाही किए बिना कागजों पर किए जाने वाले कारोबार ने बाज़ार में कमी की एक कृत्रिम तस्वीर बनाने में भूमिका निभाई है। इस तरह के लेनदेन के कारण क़ीमतों में टाली जा सकने वाली अस्थिरता पैदा हुई है और मिलों के गेट के साथ खुदरा बाज़ार में चीनी की क़ीमतें बढ़ी हैं।
सरकार ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा, सरकार उपभोक्ताओं को भरोसा दिलाती है कि देश की घरेलू खपत के लिए ज़रूरी चीनी का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। क़ीमतों पर पड़ रहा है
त्योहारो ने सरकार की बढ़ाई टेंशन
आसमान छूती चीनी की कीमतो ने सरकार की टेंशन बढ़ा दी है। क्योंकि देश में जल्द ही त्योहारो का सीजन शुरू होने वाला है। गणेश उत्सव, नवरात्र, दशहरा, दीपावली व छठ पूजा के त्योहार कुछ माह में ही आने वाले हैं। इन त्योहारो के समय चीनी की खपत बढ़ जाती है। अगर ऐसे ही चीनी की कीमते बढ़ती रही और जल्द ही सरकार कीमतो पर काबू में करती तो यह सरकार के लिए चिंता का कारण बन सकती है।
चीनी के दाम कब घटेंगे?
केतन पटेल का कहना है कि जुलाई, अगस्त और सितंबर को चीनी उत्पादन का ऑफ सीजन माना जाता है और यह अवधि त्योहारों के समय आती है। इसलिए हर साल इस दौरान बाज़ार में चीनी की क़ीमतों में बढ़ोतरी होती है।
उन्होंने कहा, अभी भले ही क़ीमतें 50 रुपये से ऊपर हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि सीजन के दौरान आम तौर पर क़ीमतें 38 से 42 रुपये के बीच रही हैं। उस क़ीमत पर मिलें किसानों को फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस यानी एफ़आरपी भी समय पर नहीं दे पातीं। यही वजह है कि कुछ किसान गन्ने की जगह दूसरी फसलों की ओर चले गए हैं, जिनसे तीन या छह महीने में रिटर्न मिल जाता है। बाज़ार भाव बढ़ने का मिलों को फ़ायदा यह है कि उनका स्टॉक बिक जाएगा और वे किसानों को समय पर एफ़आरपी का भुगतान कर पाएंगी। उन्होंने आगे कहा, अक्तूबर से नई चीनी बाज़ार में आएगी, इसलिए क़ीमतों में गिरावट देखने को मिलेगी।
हालांकि, सुरेंद्रनगर के चीनी के प्रमुख व्यापारी धनराज कैला ने मीडिया से बात करते हुए कहा, फ़िलहाल बाजार में चीनी की कमी भी नहीं है और बहुत ज्यादा स्टॉक भी नहीं है। स्थिति हैंड-टू-माउथ यानी ऐसी है कि बाज़ार में जितनी चीनी आ रही है, वह तुरंत बिक जा रही है। इसका कारण यह है कि दुनिया में भी चीनी का स्टॉक कम है। दूसरी ओर, 30 लाख टन चीनी को इथेनॉल बनाने के लिए डायवर्ट किया गया और काफ़ी मात्रा में चीनी का निर्यात भी हुआ है।
उन्होंने कहा, जब देश में चीनी के करीब डेढ़ अरब उपभोक्ता हों और एक-दो साल सूखा पड़ जाए, तो इथेनॉल ब्लेंडिंग जैसे कार्यक्रम जोखिम भरे हो जाते हैं। लोगों में यह डर बैठ गया है कि अल नीनो के कारण बारिश नहीं होगी और चीनी और महंगी होगी। यह भी कारण है कि जैसे ही चीनी के रेट बढ़ने शुरू हुए लोगों ने भविष्य में चीनी के भाव और बढ़ने की आशंका में चीनी का स्टाक करना शुरू कर दिया है।
क्या पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल की वजह से चीनी महंगी हुई है?
कच्चे तेल की खपत के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है। लेकिन भारत में इस्तेमाल होने वाले कच्चे तेल का 80 फ़ीसदी से ज्यादा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। इस आयात को कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने, आत्मनिर्भरता बढ़ाने और प्रदूषण कम करने के लिए केंद्र सरकार ने 2018 में पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल की मात्रा को 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 फ़ीसदी करने का फ़ैसला किया था। यह लक्ष्य 2030 में हासिल किया जाना था, लेकिन सरकार ने इसे जुलाई 2025 में ही हासिल कर लिया।
देश में चीनी उद्योग सरकारी नियंत्रण के तहत आता है। चीनी मिलों को किसानों से ख़रीदे गए गन्ने के लिए कितना एफ़आरपी देना होगा, यह केंद्र सरकार तय करती है। सरकार यह भी तय करती है कि कौन-सी चीनी मिल हर महीने कितनी चीनी बेच सकती है और चीनी का निर्यात किया जा सकता है या नहीं। देश में बड़े पैमाने पर इथेनॉल ख़रीदने वाला ग्राहक भी सरकार ही है और इस तरह इथेनॉल की क़ीमत भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार ही तय करती है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 के चीनी वर्ष में 30 लाख टन चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने के लिए किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक़, यह देश में चीनी के कुल उत्पादन का क़रीब 10 फ़ीसदी है।
गन्ने के रस के अलावा चीनी बनाने के दौरान तैयार होने वाले सिरप, ए-हेवी मोलासिस, बी-हेवी मोलासिस और सी-हेवी मोलासिस से भी इथेनॉल बनाया जा सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में उत्पादित कुल इथेनॉल का क़रीब एक-तिहाई हिस्सा गन्ने से तैयार किया गया था।
एक प्रसिद्ध चीनी मिल के वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर मीडिया को बताया कि ‘इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है और यह चीनी मिलों को नक़दी उपलब्ध कराता है। लेकिन सरकार इस बात को लेकर स्पष्ट रही है कि चीनी का उत्पादन हमेशा पहली प्राथमिकता है।
उन्होंने कहा, ‘यह आरोप लगाना आसान है कि सरकार ने इथेनॉल के उत्पादन के लिए चीनी को डायवर्ट होने से नहीं रोका. लेकिन यहाँ यह याद रखना ज़रूरी है कि चीनी उत्पादन के शुरुआती अनुमान काफ़ी ज्यादा थे। समस्या यह है कि गन्ने और चीनी के उत्पादन का सटीक अनुमान लगाने के लिए हमारे पास कोई सटीक तरीक़ा या तकनीक उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हम चीनी के कितने बड़े बाजार की बात कर रहे हैं. इसलिए यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि इथेनॉल के उत्पादन के लिए डायवर्ट की गई चीनी के कारण अब देश में चीनी की कमी पैदा हो गई है।
