उत्तर प्रदेश से शामिल किए गए नेताओं को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज
अखिलेश के पीडीए के जवाब में भाजपा का सामाजिक संतुलन?
नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा के बाद उत्तर प्रदेश से शामिल किए गए नेताओं को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब करीब छह महीने का समय शेष है। ऐसे में राष्ट्रीय संगठन में यूपी को मिली अहम हिस्सेदारी को राजनीतिक विश्लेषक आगामी विधानसभा चुनाव और 2029 की राष्ट्रीय राजनीति की तैयारियों से जोड़कर देख रहे हैं।
भाजपा की नई टीम में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी, पूर्व सांसद रेखा वर्मा, राज्यसभा सांसद संगीता यादव और अमरपाल मौर्य, बुलंदशहर के सांसद डॉ. भोला सिंह, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति तारिक मंसूर तथा भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बासित अली को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिली हैं। वहीं प्रतापगढ़ के डॉ. स्वदेश सिंह को राष्ट्रीय मंत्री बनाया गया है। महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने की भी चर्चा है।
यूपी को साधने में सामाजिक समीकरण पर जोर
उत्तर प्रदेश लोकसभा की 80 सीटों वाला देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य है। यही वजह है कि भाजपा की राष्ट्रीय टीम में यूपी के नेताओं की मौजूदगी को केवल संगठनात्मक विस्तार के रूप में नहीं देखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक नई टीम में महिलाओं के साथ ओबीसी, दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम समाज के विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश दिखाई देती है। इसके साथ ही पार्टी ने उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों के नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में स्थान देकर क्षेत्रीय संतुलन साधने का प्रयास भी किया है।
भाजपा के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी का कहना है कि राष्ट्रीय संगठन में यूपी को मिली हिस्सेदारी को सीधे चुनाव से जोड़ना उचित नहीं है। उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश देश में सबसे अधिक लोकसभा सीटों वाला राज्य है और उसकी राजनीतिक महत्ता के अनुपात में ही राष्ट्रीय संगठन में प्रतिनिधित्व मिला है। हालांकि उनका यह भी मानना है कि नई टीम से कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा होगा और इसका लाभ चुनाव में मिल सकता है।
हरीश द्विवेदी को बड़ी जिम्मेदारी
नई टीम में हरीश द्विवेदी को राष्ट्रीय महामंत्री की जिम्मेदारी मिलना खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बस्ती से दो बार सांसद रह चुके द्विवेदी की राजनीतिक यात्रा विद्यार्थी परिषद से शुरू होकर भाजपा युवा मोर्चा और राष्ट्रीय संगठन तक पहुंची है। 2024 का लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है। द्विवेदी का कहना है कि भाजपा कैडर आधारित पार्टी है और संगठन में जिम्मेदारियां कार्यकर्ताओं की योग्यता और क्षमता के आधार पर दी जाती हैं। उनके अनुसार पार्टी ने उन्हें पहले भी असम का प्रभारी और राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव की जिम्मेदारी दी है।
राजनीतिक विश्लेषक इसे भाजपा के ब्राह्मण सामाजिक समीकरण और अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति से भी जोड़कर देख रहे हैं।
अखिलेश के पीडीए के जवाब में भाजपा का सामाजिक संतुलन?
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के पीडीएकृपिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यककृसमीकरण को मिली सफलता ने भाजपा के सामने नया राजनीतिक सवाल खड़ा किया है। 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के साथ आने की संभावनाओं के बीच भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व मिलना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय के मुताबिक नई टीम में यूपी से शामिल नेताओं को केवल व्यक्तिगत नियुक्तियों के रूप में देखना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार पार्टी ने क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है। भाजपा संगठनात्मक रूप से यूपी को काशी, गोरखपुर, अवध, कानपुर-बुंदेलखंड, ब्रज और पश्चिम क्षेत्र में देखती है और नई टीम में विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व दिखाई देता है।
पसमांदा समाज तक पहुंच बढ़ाने का संकेत
तारिक मंसूर और कुंवर बासित अली को राष्ट्रीय संगठन में महत्व मिलने को भाजपा की अल्पसंख्यक, खासकर पसमांदा मुस्लिम समाज तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति तारिक मंसूर पहले से भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और उन्हें इसी पद पर बरकरार रखा गया है। वहीं कुंवर बासित अली भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष हैं। विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े लाभार्थी वर्ग में पसमांदा मुस्लिम समाज की मौजूदगी को देखते हुए पार्टी इस वर्ग में अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रही है। हालांकि चुनावी स्तर पर इसका प्रभाव कितना पड़ेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
स्मृति ईरानी की वापसी भी चर्चा में
पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने को भी यूपी की राजनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। 2019 में अमेठी से राहुल गांधी को हराकर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा प्रभाव बनाने वाली ईरानी को 2024 में अमेठी से हार का सामना करना पड़ा था। अब राष्ट्रीय संगठन में उनकी वापसी को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वह भाजपा की प्रमुख महिला नेताओं और प्रभावशाली वक्ताओं में शामिल रही हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उनकी भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। हालांकि विश्लेषकों का एक वर्ग यह सवाल भी उठा रहा है कि राष्ट्रीय संगठन में उनकी भूमिका केवल संगठन तक सीमित रहेगी या उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी उनका प्रभाव बढ़ेगा।
नियुक्तियों का चुनावी असर कितना?
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस बात पर मतभेद है कि भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में यूपी के नेताओं को मिली जिम्मेदारियां चुनाव में कितना प्रभाव डाल पाएंगी। एक वर्ग इसे सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को मजबूत करने की रणनीति मान रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे फिलहाल संगठनात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित मानता है।
विश्लेषकों के मुताबिक किसी समाज को केवल प्रतिनिधित्व देना पर्याप्त नहीं है। उस समाज में संबंधित नेता की वास्तविक पकड़, लोकप्रियता और संगठनात्मक क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश को अपनी राष्ट्रीय संगठनात्मक रणनीति के केंद्र में रखा है। अब देखना होगा कि नई टीम के चेहरे 2027 के विधानसभा चुनाव में संगठन को कितना मजबूत करते हैं और पार्टी के सामाजिक समीकरणों को जमीन पर कितना चुनावी लाभ मिल पाता है।

