
राष्ट्रीय पंचायत, नई दिल्ली।
दलित इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के सम्मानित रजिस्टर्ड सदस्यों को संबोधित करते हुए डॉ. जितेन्द्र पासवान ने कहा कि समाज के उद्यमी और कारीगर आर्थिक विकास के वाहक हैं। यदि पारंपरिक हुनर, घरेलू एवं कुटीर उद्योगों को आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण, बाजार और वित्तीय सहायता से जोड़ा जाए तो रोजगार के साथ-साथ समाज में आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिल सकता है।
उन्होंने कहा कि आज SFURTI—Scheme of Fund for Regeneration of Traditional Industries पारंपरिक उद्योगों को क्लस्टर के रूप में विकसित करने वाली महत्वपूर्ण केंद्रीय योजना है। योजना के माध्यम से कारीगरों को सामूहिक सुविधाएं, आधुनिक मशीनरी, प्रशिक्षण, डिजाइन, पैकेजिंग तथा बाजार से जोड़ने जैसी सुविधाओं के लिए सहायता उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
देशभर में सैकड़ों क्लस्टर हुए विकसित
डॉ. पासवान द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2025-26 तक देश में स्फूर्ति के अंतर्गत 513 क्लस्टर स्वीकृत किए गए हैं। इनमें 378 क्लस्टर कार्यशील बताए गए हैं, जबकि 135 क्लस्टर कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। इन क्लस्टरों से लगभग 3.03 लाख कारीगरों को लाभ पहुंचने की जानकारी दी गई है।
क्षेत्रवार देखें तो एग्रो प्रोसेसिंग, हस्तशिल्प, कोयर, बांस और शहद जैसे पारंपरिक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में क्लस्टर विकसित किए गए हैं। इससे स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक कौशल को संगठित उद्योग के रूप में विकसित करने का अवसर मिलता है।
Common Facility Centre बन सकता है विकास का आधार
स्फूर्ति के अंतर्गत क्लस्टर आधारित गतिविधियों में Common Facility Centre (CFC) महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें आधुनिक मशीनरी, परीक्षण सुविधाएं, पैकेजिंग एवं उत्पादन से संबंधित साझा आधारभूत सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। इसके साथ डिजाइन विकास, ब्रांडिंग, मार्केटिंग, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर तथा ऑनलाइन बाजार से जुड़ने की दिशा में भी कार्य किया जा सकता है।
डॉ. पासवान ने कहा कि छोटे-छोटे कारीगरों को व्यक्तिगत स्तर पर बाजार और आधुनिक तकनीक तक पहुंच बनाने में कठिनाई होती है, जबकि क्लस्टर मॉडल उन्हें सामूहिक रूप से सुविधाएं उपलब्ध कराने का अवसर देता है।
राज्य स्तर पर क्लस्टर विकसित करने की प्रक्रिया
उन्होंने बताया कि स्फूर्ति योजना के तहत क्लस्टर विकास के लिए पात्र संस्थाओं को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार Implementing Agency की भूमिका निभानी होती है। इसके बाद संबंधित तकनीकी एजेंसी द्वारा Detailed Project Report (DPR) तैयार करने सहित परियोजना के विभिन्न तकनीकी पहलुओं पर कार्य किया जाता है। परियोजना की स्वीकृति और सहायता संबंधित सरकारी दिशा-निर्देशों एवं निर्धारित प्रक्रिया के अधीन होती है।
उन्होंने एसोसिएशन के सदस्यों से आह्वान किया कि वे अपने क्षेत्र के बांस, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण, शहद, कोयर तथा अन्य पारंपरिक उद्योगों को संगठित कर क्लस्टर आधारित विकास की संभावनाओं पर कार्य करें।
आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए संगठित प्रयास जरूरी
डॉ. जितेन्द्र पासवान ने कहा कि “आर्थिक रूप से मजबूत समाज ही आत्मनिर्भर समाज की आधारशिला बन सकता है।” इसलिए उद्यमियों, कारीगरों और छोटे उद्योग संचालकों को सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर उनका नियमानुसार लाभ उठाना चाहिए।
उन्होंने दलित इंडस्ट्रीज एसोसिएशन से जुड़ने की अपील करते हुए कहा कि संगठन का उद्देश्य समाज के उद्यमियों को एक मंच पर लाकर ज्ञान, प्रशिक्षण, सरकारी योजनाओं, उद्योग एवं बाजार के अवसरों की जानकारी उपलब्ध कराना है।
उन्होंने कहा कि पारंपरिक हुनर को आधुनिक उद्योग से जोड़कर गांवों और छोटे शहरों में रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। यही प्रयास व्यापक स्तर पर सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण का आधार बन सकता है।



