विशेष लेख | डॉ. जितेन्द्र पासवान, एससी/एसटी आर्थिक क्रांति
15 अगस्त 2026 को भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। देश तिरंगे की शान में डूबा है, स्वतंत्रता सेनानियों को नमन किया जा रहा है और जगह-जगह राष्ट्रभक्ति के कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। यह अवसर निश्चित रूप से गौरव का है।
लेकिन क्या आजादी केवल सत्ता हस्तांतरण का नाम है? क्या राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता भी समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंची? क्या शासन-सत्ता, भूमि, पूंजी, शिक्षा, उद्योग और संसाधनों में समाज के वंचित वर्गों की वास्तविक हिस्सेदारी बनी?
इन्हीं सवालों के बीच आजादी के 80 साल पूरे होने पर एक गंभीर बहस आवश्यक है।
13 अगस्त 1947 : आजादी से पहले भारत की तस्वीर
15 अगस्त 1947 से दो दिन पहले तक भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता ब्रिटिश क्राउन के हाथ में थी। वायसराय के माध्यम से औपनिवेशिक प्रशासन संचालित होता था।
पुलिस, न्याय व्यवस्था, प्रशासन, सेना, राजस्व व्यवस्था और आर्थिक नीतियां औपनिवेशिक शासन की संरचना का हिस्सा थीं। रेलवे, बंदरगाह और संचार जैसी आधारभूत संरचनाएं भी मुख्यतः औपनिवेशिक आर्थिक एवं प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप विकसित की गई थीं।
भारत में भारतीय उद्योगपति, व्यापारी, जमींदार, राजा-महाराजा और अनेक स्वदेशी संस्थाएं भी मौजूद थीं। इसलिए उस दौर को केवल “हर चीज अंग्रेजों की थी” कहकर समझना इतिहास की जटिलता को सरल बना देना होगा। लेकिन यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि सर्वोच्च संप्रभु सत्ता ब्रिटिश शासन के पास थी।
15 अगस्त 1947 : सत्ता बदली, लेकिन क्या समाज की आर्थिक संरचना भी बदल गई?
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। ब्रिटिश शासन समाप्त हुआ और भारतीय नेतृत्व के हाथ में शासन की बागडोर आई।
संविधान निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई और आगे चलकर भारत ने लोकतंत्र, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकार और सामाजिक न्याय को अपने शासन की आधारशिला बनाया।
लेकिन राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण और समाज में आर्थिक शक्ति का समान वितरण—ये दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं थीं।
यहीं से आजादी के बाद के भारत का सबसे महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है:
क्या राजनीतिक लोकतंत्र आर्थिक लोकतंत्र में भी बदल पाया?
एससी/एसटी समाज : संविधान ने अधिकार दिए, लेकिन आर्थिक बराबरी कितनी आई?
भारत के संविधान ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रतिनिधित्व और आरक्षण सहित अनेक संवैधानिक सुरक्षा उपाय प्रदान किए। शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण ने लाखों लोगों के लिए नए अवसरों के द्वार खोले।
लेकिन यह भी एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक प्रश्न है कि क्या आरक्षण ही सामाजिक न्याय की पूरी मंजिल है?
यदि किसी समुदाय के पास पर्याप्त भूमि, पूंजी, बड़े उद्योग, आधुनिक शिक्षा, वित्तीय संस्थानों तक पहुंच और उत्पादन के साधन नहीं हैं, तो केवल सीमित सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व आर्थिक समानता की पूरी गारंटी नहीं दे सकता।
इसीलिए एससी/एसटी समाज की बहस को आरक्षण बनाम गैर-आरक्षण की संकीर्ण सीमा से बाहर निकालकर भूमि, पूंजी, शिक्षा, उद्योग, उद्यमिता और संसाधनों में हिस्सेदारी तक ले जाने की जरूरत है।
“आरक्षण नामक लेमनचूस” : एक तीखी राजनीतिक उपमा
डॉ. जितेन्द्र पासवान का तर्क है कि यदि SC-ST समाज को केवल आरक्षण के माध्यम से सीमित प्रतिनिधित्व देकर यह मान लिया जाए कि सामाजिक न्याय का लक्ष्य पूरा हो गया, तो यह अधूरा दृष्टिकोण होगा।
उनके शब्दों में, “आरक्षण जरूरी है, लेकिन आरक्षण को ही आर्थिक मुक्ति का अंतिम साधन मान लेना पर्याप्त नहीं है।”
यहां “लेमनचूस” की उपमा एक राजनीतिक व्यंग्य के रूप में देखी जानी चाहिए—अर्थात ऐसा लाभ जो वास्तविक आर्थिक शक्ति की तुलना में बहुत सीमित हो।
असल सवाल यह है कि समाज के वंचित वर्गों की नई पीढ़ी सरकारी नौकरी की तलाश करने के साथ-साथ उद्योग और संपत्ति निर्माण की दिशा में कितनी आगे बढ़ रही है।
भूमि, पूंजी और उद्योग में हिस्सेदारी क्यों जरूरी?
आर्थिक शक्ति केवल वेतन से नहीं बनती।
आर्थिक शक्ति बनती है—
– भूमि और अन्य उत्पादक परिसंपत्तियों से,
– उद्योग और व्यवसाय से,
– पूंजी और निवेश से,
– गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से,
– बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थानों तक पहुंच से,
– तकनीक और कौशल से,
– बाजार और आपूर्ति श्रृंखला में भागीदारी से,
– तथा अपनी संस्थाओं और उद्यमों के निर्माण से।
इसीलिए एससी/एसटी समाज की आर्थिक क्रांति का अगला चरण “नौकरी पाने” से आगे बढ़कर “नौकरी देने” का होना चाहिए।
इतिहास की बहस को वर्तमान की आर्थिक चुनौती से जोड़ना होगा
भारतीय समाज की सामाजिक संरचना हजारों वर्षों की जटिल ऐतिहासिक प्रक्रियाओं से बनी है। आर्य, अनार्य, विभिन्न जनजातीय समुदायों, मध्यकालीन शासकों, मुगल शासन, औपनिवेशिक शासन और आधुनिक भारतीय राज्य—इन सभी ने भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था को अलग-अलग रूपों में प्रभावित किया है।
लेकिन आज के भारत में किसी पूरे समुदाय को उसके कथित ऐतिहासिक वंश के आधार पर वर्तमान आर्थिक स्थिति के लिए दोषी ठहराना समाधान नहीं है।
आज की असली लड़ाई व्यक्ति या जाति के विरुद्ध नहीं, बल्कि असमान अवसरों और आर्थिक केंद्रीकरण के विरुद्ध होनी चाहिए।
इसी दृष्टि से सवाल पूछा जाना चाहिए कि आजादी के 80 वर्षों बाद देश की भूमि, पूंजी, उद्योग, शिक्षा, तकनीक और बाजार में SC-ST तथा अन्य वंचित समुदायों की हिस्सेदारी कितनी बढ़ी है।
तिरंगा केवल राजनीतिक आजादी का नहीं, आर्थिक न्याय का भी प्रतीक बने
15 अगस्त को तिरंगा हर भारतीय के लिए समान सम्मान का प्रतीक है।
लेकिन उस तिरंगे की शान तब और बढ़ेगी जब—
हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले,
हर युवा को कौशल और पूंजी मिले,
हर परिवार को सम्मानजनक रोजगार मिले,
हर उद्यमी को बाजार तक पहुंच मिले,
और हर वंचित समुदाय को आर्थिक शक्ति निर्माण का अवसर मिले।
राजनीतिक लोकतंत्र की सफलता तभी पूर्ण मानी जाएगी जब उसके साथ सामाजिक लोकतंत्र और आर्थिक लोकतंत्र भी मजबूत हों।
अब सवाल केवल “किसका शासन?” का नहीं, “किसकी आर्थिक हिस्सेदारी?” का है
1947 में प्रश्न था—शासन किसका होगा?
आज प्रश्न होना चाहिए—
भूमि किसके पास है?
पूंजी किसके पास है?
उद्योग किसके पास हैं?
बड़े व्यवसायों में हिस्सेदारी किसकी है?
आधुनिक शिक्षा और तकनीक तक पहुंच किसकी है?
बैंकिंग और निवेश में भागीदारी किसकी है?
संसाधनों से पैदा होने वाली संपदा में हिस्सेदारी किसकी है? यही प्रश्न आजादी के 80वें वर्ष को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर बना सकते हैं।
एससी/एसटी आर्थिक क्रांति : आरक्षण से आगे, आर्थिक स्वावलंबन की ओर
एससी/एसटी समाज के लिए आरक्षण संवैधानिक अधिकार है और सामाजिक प्रतिनिधित्व का महत्वपूर्ण साधन है। उसे कमजोर करने के बजाय उसके साथ आर्थिक सशक्तीकरण की नई रणनीति जोड़ने की आवश्यकता है।
इसके लिए बड़े पैमाने पर—
एससी/एसटी उद्यमिता, स्टार्टअप, कृषि-आधारित उद्योग, पोल्ट्री एवं डेयरी, शिक्षा संस्थान, कौशल विकास केंद्र, डिजिटल व्यवसाय, सहकारी संस्थाएं, MSME, स्टार्टअप फंडिंग और बाजार से सीधा जुड़ाव को बढ़ावा देना होगा।
युवाओं को यह संदेश देना होगा कि “सरकारी नौकरी लक्ष्य हो सकती है, लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता का एकमात्र रास्ता नहीं।”
आजादी का अगला पड़ाव आर्थिक लोकतंत्र
15 अगस्त 1947 ने भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता दी। संविधान ने नागरिकों को समानता और अधिकारों का आधार दिया। अब 2026 में आजादी के 80वें वर्ष पर देश को एक और बड़े लक्ष्य की ओर देखना चाहिए—
राजनीतिक आजादी से सामाजिक न्याय और सामाजिक न्याय से आर्थिक लोकतंत्र की ओर।
तिरंगा तभी वास्तव में हर वंचित नागरिक के सपनों का प्रतीक बनेगा, जब आजादी का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और वह केवल अधिकारों का उपभोक्ता नहीं, बल्कि भूमि, पूंजी, उद्योग, ज्ञान और उत्पादन का स्वामी एवं निर्माता भी बने।
डॉ. जितेन्द्र पासवान का संदेश
«“आरक्षण अधिकार है, लेकिन आर्थिक शक्ति उसका विकल्प नहीं बल्कि अगला कदम है। SC-ST समाज को केवल प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि उत्पादन और संपत्ति निर्माण में हिस्सेदारी चाहिए। आजादी के 80वें वर्ष पर हमारा संकल्प होना चाहिए—शिक्षित बनें, संगठित हों, उद्यमी बनें और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें।”»

