
– राष्ट्रीय पंचायत ब्यूरो
बिजनौर। एक किसान के खेत से चार पेड़ काटे जाने का मामला अब सवालों के घेरे में है। पीड़ित ने आरोप लगाया कि उसके खेत में खड़े तीन यूकेलिप्टस और एक बकैन के पेड़ काटकर बेच दिए गए, लेकिन पुलिस ने मामले को आपराधिक घटना मानने के बजाय दो पक्षों के बीच भूमि विवाद बताते हुए शिकायत का निस्तारण कर दिया। अब सवाल उठ रहा है कि यदि पेड़ वास्तव में काटे गए हैं, तो उनकी जिम्मेदारी किसकी है और पीड़ित को नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
’’क्या है पूरा मामला?’’
शहर कोतवाली क्षेत्र के ’’गांव अमीपुर सुधा’’ निवासी ’’रशीद अहमद’’ ने जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई कि तहसील बिजनौर के ’’मौजा मधुसूदनपुर जागन’’ स्थित ’’गाटा संख्या-65क’’ में उसकी और उसके भाइयों की कृषि भूमि है। इसी खेत में तीन यूकेलिप्टस और एक बकैन का पेड़ खड़ा था। जब वह खेत पर पहुंचा तो चारों पेड़ कटे मिले। ग्रामीणों से जानकारी करने पर आरोप लगा कि ’’गजरौला शिव निवासी करण पुत्र सुक्खे सिंह’’ ने पेड़ कटवाए हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि बाजार भाव के अनुसार इन पेड़ों की कीमत करीब ’’10 से 12 हजार रुपये’’ थी। उसने आरोपी के खिलाफ कार्रवाई और पेड़ों की कीमत अर्थदंड सहित दिलाने की मांग की।
’’जनसुनवाई पर क्या हुआ?’’
13 मई 2026 को दर्ज शिकायत (संख्या 40013426014777) को पुलिस ने जांच के लिए लिया। और, मौके पर जाए बगैर, पीड़ित, आरोपी और अन्य ग्रामीणों से पूछताछ किए बिना ही शिकायत का निस्तारण कर दिया। शिकायतकर्ता रशीद अहमद ने बताया कि 10 जून की रात गांव में पुलिस आई, और किसी चेयरमैन के बारे में पूछताछ के बहाने से बातचीत की।
इसी दौरान दूसरे पुलिसकर्मी ने चुपके से फोटो खींच लिया। जबकि, पेड़ काटने वाली शिकायत पर न तो कोई बात की, और न ही पुलिस ने मौके पर जाकर देखा। बस, मनमर्जी से मनगढ़ंत आख्या पोर्टल पर अपलोड करके शिकायत कर निस्तारण कर दिया। जांच करने वाले अधिकारी उपनिरीक्षक रामनिवास शर्मा द्वारा जनसुनवाई पोर्टल पर अपलोड आख्या में लिखा है कि दोनों पक्षों के बीच ’’जमीन पर कब्जे और रास्ते को लेकर पुराना विवाद’’ चल रहा है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि इसी विवाद के चलते पहले भी ’’शांति भंग की आशंका में कार्रवाई’’ की जा चुकी है तथा दोनों पक्षों के विरुद्ध प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई थी। इसके बाद शिकायत का निस्तारण कर दिया गया।
’’लेकिन बड़ा सवाल अभी बाकी है…’’
पुलिस की आख्या में भूमि विवाद का उल्लेख है, लेकिन शिकायत का मूल आरोप ’’पेड़ काटे जाने’’ का था। ऐसे में कई सवाल खड़े हो रहे हैं कि-
– क्या मौके पर यह सत्यापित किया गया कि पेड़ वास्तव में कटे थे या नहीं?
– यदि पेड़ कटे थे, तो उन्हें किसने काटा?
– कटी हुई लकड़ी कहां गई?
– पेड़ों की कीमत का आकलन किस विभाग ने किया?
– वन विभाग या राजस्व विभाग से कोई रिपोर्ट ली गई या नहीं?
– यदि यह केवल भूमि विवाद था, तो पेड़ कटने के आरोप का निस्तारण किस आधार पर किया गया?
’’पीड़ित को अब भी न्याय का इंतजार’’
शिकायतकर्ता रशीद अहमद का कहना है कि उसकी मुख्य मांग पेड़ों की कीमत दिलाने और दोषी के खिलाफ कार्रवाई करने की थी, लेकिन शिकायत को केवल भूमि विवाद मानकर बंद कर दिया गया। इससे उसके आर्थिक नुकसान की भरपाई का सवाल आज भी अनुत्तरित है।
वहीं, पेड़ किसी भी किसान की वर्षों की मेहनत और संपत्ति होते हैं। यदि किसी की निजी भूमि से पेड़ काटे जाते हैं, तो यह संपत्ति नुकसान के साथ ही संभावित आपराधिक कृत्य का भी विषय बन सकता है। ऐसे में आवश्यक है कि संबंधित विभाग यह स्पष्ट करे कि ’’पेड़ कटने के आरोप की स्वतंत्र जांच हुई या नहीं’’, और यदि हुई तो उसका निष्कर्ष क्या रहा।
’’जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने नहीं आते, तब तक यह मामला केवल एक जनसुनवाई शिकायत का निस्तारण नहीं, बल्कि जांच की निष्पक्षता और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता रहेगा।’’