’’विशेष संवाददाता’’
इंट्रों
मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से सामने आई एक ऐसी घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है, जिसने आधुनिक भारत में इंसानियत पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस दौर में देश विकास, रोजगार और श्रमिक अधिकारों की बातें कर रहा है, उसी दौर में एक फैक्ट्री के भीतर कथित तौर पर ’’12 मजदूरों को बंधक बनाकर गुलामों जैसी जिंदगी जीने पर मजबूर किया जा रहा था।’’
यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि पुलिस और प्रशासन के ’’ऑपरेशन मुक्ति’’ के दौरान सामने आई भयावह हकीकत है। छापेमारी में जो तस्वीरें और बयान सामने आए, उन्होंने हर किसी को सन्न कर दिया। यह घटना केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि श्रमिक अधिकारों, प्रशासनिक निगरानी और मानवीय संवेदनाओं की भी कठोर परीक्षा है। जब रोजगार के नाम पर किसी इंसान की आजादी छीन ली जाए, उसे यातनाएं दी जाएं और उसे पशुओं से भी बदतर हालात में जीने को मजबूर किया जाए, तब यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं रहतीकृयह पूरे समाज के लिए चेतावनी बन जाती है।
पुलिस ने इस मामले में ’’शिवा त्यागी, प्रदीप बालियान’’ समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ बंधुआ मजदूरी, बाल श्रम और किशोर न्याय कानून सहित कई गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। बताया जा रहा है कि ’’मुख्य आरोपी अंकित बालियान’’ की तलाश जारी है।
’’स्टेशन से फैक्ट्री तक… और फिर शुरू हो गया कैद का सफर’’
जांच में सामने आया कि मजदूरों को रेलवे स्टेशन और बस अड्डों से ’’₹8 हजार से ₹12 हजार महीने की नौकरी’’ का लालच देकर मुजफ्फरनगर लाया गया था। लेकिन फैक्ट्री पहुंचते ही उनकी उम्मीदें कैद में बदल गईं। मजदूरों के मुताबिक उनसे जबरन दिन-रात काम कराया जाता था और बाहर निकलने की कोई आजादी नहीं थी।
’’रोटी नहीं… चोकर और सूखी मिर्च!’’
मजदूरों ने जो आपबीती सुनाई, वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकती है। उनका आरोप है कि उन्हें पेट भर खाना तक नहीं दिया जाता था। कई बार खाने के नाम पर केवल ’’आटे का चोकर और सूखी मिर्च’’ दी जाती थी। 24-24 घंटे काम, न आराम, न इलाज और न ही घर लौटने की कोई उम्मीद।
’’बेल्ट, हथौड़ा और गर्म सरियों से दी जाती थी सजा’’
सबसे भयावह आरोप यह है कि काम में जरा-सी कमी या विरोध करने पर मजदूरों को बेरहमी से पीटा जाता था। पीड़ितों के अनुसार उन्हें ’’बेल्ट से मारा जाता, हथौड़े से पीटा जाता और गर्म लोहे की सरियों से शरीर दागा जाता था।’’ उनके शरीर पर चोट और जलने के निशान कथित तौर पर इस क्रूरता की कहानी खुद बयान कर रहे हैं।
’’भागने की कोशिश… तो सामने पिटबुल और तमंचा’’
मजदूरों ने आरोप लगाया कि फैक्ट्री से भागना लगभग असंभव बना दिया गया था। फैक्ट्री के गेट पर ’’पिटबुल कुत्ते’’ तैनात रहते थे, जबकि डर पैदा करने के लिए कथित तौर पर ’’अवैध तमंचे से हवा में फायरिंग’’ की जाती थी, ताकि कोई मजदूर भागने की हिम्मत न जुटा सके।
’’ऑपरेशन मुक्ति ने खोली बंद फैक्ट्री की परतें’’
शिकायत मिलने के बाद पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीम ने फैक्ट्री पर छापा मारा। कार्रवाई के दौरान ’’12 मजदूरों को मुक्त कराया गया’’, जिनमें अलग-अलग राज्यों के श्रमिकों के साथ ’’एक नेपाली नागरिक’’ भी शामिल बताया गया है। अधिकारियों के अनुसार कुछ पीड़ित नाबालिग भी हैं।
’’सबसे बड़ा सवाल… आखिर यह चलता कैसे रहा?’’
यह मामला केवल एक फैक्ट्री का नहीं है। यह उन तमाम सवालों को जन्म देता है, जिनका जवाब प्रशासन, श्रम विभाग और स्थानीय तंत्र को देना होगा। जैसे-
– क्या फैक्ट्री का कभी निरीक्षण नहीं हुआ?
– मजदूर महीनों तक बंधक रहे, फिर किसी विभाग को भनक क्यों नहीं लगी?
– श्रम कानूनों का पालन कौन सुनिश्चित कर रहा था?
– यदि छापा न पड़ता, तो क्या यह अमानवीय खेल यूं ही चलता रहता?
’’बंधुआ मजदूरी केवल इतिहास की किताबों का विषय नहीं…”
मुजफ्फरनगर की यह घटना याद दिलाती है कि ’’बंधुआ मजदूरी केवल इतिहास की किताबों का विषय नहीं है, बल्कि यदि निगरानी कमजोर पड़े तो वह आज भी हमारे समाज में जीवित हो सकती है।’’
पुलिस की कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती हैकृक्या पीड़ितों को न्याय मिलेगा? क्या दोषियों को ऐसी सजा मिलेगी जो भविष्य में किसी और फैक्ट्री को इंसानियत का कत्लखाना बनने से रोक सके? ’’जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक ऑपरेशन मुक्ति अधूरा माना जाएगा।’’
