’’जब जंगल का मेहमान शहर की सड़क पर उतर आया…’’ आखिर कसूर किसका… ?
– रवींद्र कुमार, समाचार संपादक
कर्नाटक के दांदेली की एक तस्वीर ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। जंगल का एक विशाल मगरमच्छ अचानक रिहायशी इलाके की सड़क पर दिखाई दिया। कुछ देर तक वह गलियों में घूमता रहा। लोग हैरान थे, लेकिन उन्होंने संयम नहीं खोया। किसी ने पत्थर नहीं उठाया, न ही उसे मारने की कोशिश की। वन विभाग को सूचना दी गई और कुछ ही देर में विशेषज्ञों ने मगरमच्छ का सुरक्षित रेस्क्यू कर उसे काली नदी में छोड़ दिया।
यह घटना सोशल मीडिया पर भले ही एक रोमांचक वीडियो बनकर वायरल हुई हो, लेकिन असल में यह प्रकृति की एक खामोश चेतावनी है।
सवाल यह नहीं कि मगरमच्छ शहर में कैसे आ गया। असली सवाल यह है कि ’’ऐसी नौबत आखिर क्यों आई कि जंगल का जीव अपने घर से निकलकर इंसानों की बस्ती तक पहुंच गया?’’
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में देशभर में वन्यजीवों के शहरों और गांवों में आने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। कहीं तेंदुआ कॉलोनियों में घूमता दिखाई देता है, कहीं हाथियों के झुंड खेतों में उतर आते हैं, कहीं भालू आबादी में पहुंच जाते हैं और अब मगरमच्छ भी सड़कों पर नजर आने लगे हैं। यह महज संयोग नहीं, बल्कि बदलते पर्यावरण का संकेत है।
जंगल लगातार सिकुड़ रहे हैं। नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बदल रहा है। तालाब, दलदल और जलाशय समाप्त हो रहे हैं। शहरों का विस्तार उन क्षेत्रों तक पहुंच चुका है, जो कभी वन्यजीवों के सुरक्षित आवास हुआ करते थे। जब इंसान प्रकृति की सीमाएं लांघता है, तब प्रकृति भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए हमारे दरवाजे तक पहुंच जाती है।
दांदेली की घटना में एक सकारात्मक संदेश भी छिपा है। स्थानीय लोगों ने घबराहट में कोई ऐसी हरकत नहीं की, जिससे मगरमच्छ या किसी व्यक्ति की जान खतरे में पड़ती। वन विभाग ने भी पेशेवर तरीके से रेस्क्यू कर यह साबित किया कि जागरूक नागरिक और प्रशिक्षित प्रशासन मिलकर किसी भी संकट को टाल सकते हैं।
लेकिन हर जगह हालात इतने अनुकूल नहीं होते। कई बार डर और अफवाह के कारण वन्यजीवों पर हमला कर दिया जाता है, जबकि वे अधिकांश मामलों में केवल रास्ता भटककर या भोजन और सुरक्षित आवास की तलाश में मानव बस्तियों तक पहुंचते हैं। वे हमला करने नहीं, बल्कि बचने की कोशिश कर रहे होते हैं।
यही कारण है कि अब केवल वन्यजीव संरक्षण की बातें करना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता उनके प्राकृतिक आवासों को बचाने की है। जंगल, नदियां, आर्द्रभूमि और जैव विविधता केवल पर्यावरण का हिस्सा नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा कवच भी हैं। यदि इन्हें लगातार नष्ट किया जाएगा, तो इंसान और वन्यजीव के बीच टकराव बढ़ना तय है।
दांदेली का मगरमच्छ हमें डराने नहीं आया था। वह अनजाने में हमें एक आईना दिखाकर चला गया-एक ऐसा आईना, जिसमें साफ दिखाई देता है कि विकास की अंधी दौड़ में हमने प्रकृति की सीमाओं को कितना पीछे छोड़ दिया है।
