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परिषदीय लिपिक की नियुक्ति पर घमासान, जांच के दावों पर भी उठे प्रश्न

- शिक्षा विभाग में परिषदीय लिपिक की नियुक्ति को लेकर शिकायतकर्ता के दस्तावेज और विभागीय दावे आमने-सामने, निष्पक्ष जांच की मांग तेज

बिजनौर। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय से जुड़े एक परिषदीय लिपिक की मृतक आश्रित नियुक्ति और शैक्षिक अभिलेखों को लेकर उठे विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। शिकायतकर्ता द्वारा मुख्यमंत्री, बेसिक शिक्षा मंत्री, शिक्षा निदेशक और जिलाधिकारी सहित विभिन्न अधिकारियों को भेजी गई शिकायत में नियुक्ति के आधार बने शैक्षिक प्रमाण-पत्रों और विद्यालयीय रिकॉर्ड में गंभीर विरोधाभास होने का दावा किया गया है। वहीं, विभागीय स्तर पर मामले को पहले ही जांचा जा चुका बताते हुए आरोपों को निराधार करार दिया जा रहा है। हालांकि जांच के संबंध में पूछे गए सवालों पर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आने से विवाद और गहरा गया है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि संबंधित कर्मचारी वर्ष 1994-95 में विद्यालय के अभिलेखों के अनुसार कक्षा-11 का छात्र था, जबकि उसी अवधि में कक्षा-12 उत्तीर्ण होने का प्रमाण-पत्र और अंकपत्र प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख सेवा अभिलेखों में दर्ज है। शिकायत में विद्यालय की प्रवेश पंजिका, स्थानांतरण प्रमाण-पत्र (टीसी) तथा अन्य दस्तावेजों का हवाला देते हुए पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई है।

मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू मानव सम्पदा पोर्टल पर दर्ज विवरणों को लेकर सामने आया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि पोर्टल पर उपलब्ध कुछ प्रविष्टियां वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खातीं। इसी आधार पर पोर्टल की एडिट हिस्ट्री, लॉग और अनुमोदन से संबंधित रिकॉर्ड की भी जांच कराए जाने की मांग उठाई गई है।

इस संबंध में टारगेट टीवी न्यूज पोर्टल के हेड अवनीश त्यागी की जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी सचिन कसाना से हुई बातचीत में चौंका देने वाली कई बातें सामने आई हैं। बीएसए ने बातचीत में कहा कि इस मामले में पहले भी कई शिकायतें हुई हैं और जांच में कोई ऐसा तथ्य सामने नहीं आया, जिससे आरोपों की पुष्टि होती हो। लेकिन, जब उनसे यह पूछा गया कि जांच किस अधिकारी ने की, कब की गई और उसका निष्कर्ष क्या था, तो इस संबंध में बीएसए द्वारा कोई जानकारी मुहैया नहीं कराई गई।

ऐसे में शिकायतकर्ता की शिकायत को निराधार और बेकार करार देना सरासर बईमानी होगा। प्रशासनिक मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि किसी शिकायत को जांच के बाद निराधार बताया गया है, तो जांच अधिकारी, जांच की तिथि और निष्कर्ष को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। विशेष रूप से तब, जब मामला सरकारी नियुक्ति और शैक्षिक प्रमाण-पत्रों से जुड़ा हो।

शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराने की मांग दोहराते हुए कहा है कि यदि सभी अभिलेख सही हैं, तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए। वहीं, शिक्षा विभाग की ओर से अब तक जांच रिपोर्ट अथवा विस्तृत स्पष्टीकरण सार्वजनिक नहीं किया गया है।

ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह बन गया है कि यदि विभाग का दावा है कि आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है, तो पूर्व में हुई जांच का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? जब तक इन सवालों के जवाब सामने नहीं आते, तब तक यह विवाद थमता हुआ नहीं दिख रहा है।

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