– गोविन्द सिंह बौद्ध
आज जब कोई आईएएस, आईपीएस या बड़ा अफ़सर यह कहता है कि उसने सिर्फ़ अपनी मेहनत से यह पद हासिल किया है, तो यह कथन पूरी तरह झूठ नहीं, लेकिन पूरा सच भी नहीं है। मेहनत निस्संदेह की गई, पढ़ाई की गई, संघर्ष हुआ — लेकिन यह भूल जाना कि यह मेहनत किन परिस्थितियों में संभव हो पाई, एक तरह का ऐतिहासिक अन्याय है।
काबिलियत तब भी थी, अवसर नहीं थे
यह मान लेना कि काबिलियत सिर्फ़ आज की पीढ़ी में पैदा हुई है, एक घोर भ्रम है।
हकीकत यह है कि:
काबिलियत उन पूर्वजों में भी थी
बुद्धि, परिश्रम और प्रतिभा तब भी मौजूद थी
लेकिन पढ़ने, आगे बढ़ने और सोचने का अधिकार नहीं था
सदियों तक समाज के एक बड़े वर्ग को शिक्षा से दूर रखा गया, सिर्फ़ इसलिए कि वे “गलत जाति” में पैदा हुए थे।
अधिकार यूँ ही नहीं मिले — किसी ने ज़ंजीरें काटी हैं
आज जो अधिकार आपको सहज रूप से मिले हैं —
स्कूल में दाख़िला
प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का अवसर
संविधान द्वारा प्रदत्त समानता
ये सब दान में नहीं मिले।
इन्हें हासिल करने के लिए महापुरुषों ने:
सामाजिक बहिष्कार सहा
अपमान झेला
जेलें काटीं
और सदियों पुरानी गुलामी की ज़ंजीरों को अपने खून-पसीने से तोड़ा
संविधान: मेहनत को अधिकार में बदलने वाला दस्तावेज़
अगर संविधान नहीं होता, तो:
संविधान ने ही यह सुनिश्चित किया कि
मेहनत सिर्फ़ ताक़तवरों का विशेषाधिकार न रहे, बल्कि हर नागरिक का अधिकार बने।
सफलता का अहंकार नहीं, इतिहास की समझ ज़रूरी
इसलिए जब आप अपनी सफलता का श्रेय सिर्फ़ खुद को देते हैं, तो याद रखिए:
आपकी मेहनत एक ऐतिहासिक संघर्ष की नींव पर खड़ी है
आपके पीछे उन अनगिनत नामों का बलिदान है, जिन्हें इतिहास ने अक्सर हाशिये पर डाल दिया
सच्ची महानता सफलता में नहीं, बल्कि उस सफलता के सामाजिक सच को स्वीकार करने में है।
आभार और संवेदनशीलता के बिना सफलता, सिर्फ़ पद है — मूल्य नहीं।
मेहनत पर गर्व करें —
लेकिन यह न भूलें कि:
मेहनत करने का अधिकार संविधान ने दिया
अवसर समाज सुधारकों ने दिलाया
और बराबरी का रास्ता महापुरुषों ने बनाया