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राजशाही से लोकशाही के सफर में गुम हुआ पंचायत राज

“गणतंत्र दिवस पर विशेष”

– वीरेश तरार
भारत की स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन की घटना नहीं थी, बल्कि वह एक वैचारिक व नैतिक प्रतिज्ञा थी। इस प्रतिज्ञा का नाम था-स्वराज। लेकिन, आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या स्वराज वास्तव में लोकशाही के रूप में साकार हो पाया, या वह औपनिवेशिक राजशाही के ढांचे में ही एक नया राजनीतिक चेहरा भर बनकर रह गया। इस प्रश्न के केंद्र में पंचायत राज खड़ा है-वही पंचायत राज, जिसे महात्मा गांधी ने स्वराज की आत्मा माना था, लेकिन जो राजशाही से लोकशाही के इस लंबे सफर में कहीं गुम हो गया।

महात्मा गांधी के लिए स्वराज का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था। उनके स्वराज की कल्पना में भारत का शासन नीचे से ऊपर की ओर बहता था। गांव, समाज और व्यक्ति-तीनों इस स्वराज के मूल स्तंभ थे। गांधी का मानना था कि भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है और यदि लोकतंत्र को जीवंत बनाना है तो गांव को केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि स्वशासी गणराज्य के रूप में स्थापित करना होगा। उनकी पंचायत किसी सत्ता संरचना की नकल नहीं थी, बल्कि नैतिकता, सहभागिता और उत्तरदायित्व पर आधारित लोकव्यवस्था थी, जहां शासन नहीं बल्कि स्वशासन होता।

लेकिन भारत जिस परिस्थिति में आज़ाद हुआ, वह गांधी की कल्पना से कहीं अधिक जटिल थी। औपनिवेशिक शासन ने भारत को एक ऐसी प्रशासनिक संरचना दी थी, जो राजस्व वसूली, नियंत्रण और केंद्रीकरण पर आधारित थी। अंग्रेजी राज में पंचायतें थीं, लेकिन वे जनता की नहीं, शासन की सहायक थीं। निर्णय ऊपर होते थे, और गाँव केवल आदेश पालन का केंद्र था। स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यही था कि क्या इस ढांचे को तोड़कर नया लोकतांत्रिक ढांचा खड़ा किया जाएगा, या उसी को लोकतंत्र का नाम देकर आगे बढ़ा दिया जाएगा। यहीं से संविधान निर्माण की प्रक्रिया में एक ऐतिहासिक द्वंद्व शुरू होता है। जब संविधान सभा ने शासन की रूपरेखा तय करनी शुरू की, तब डॉ. भीमराव अंबेडकर और उनके साथ मौजूद अनेक सदस्य भारतीय समाज के उस यथार्थ से भली-भांति परिचित थे, जिसमें गाँव केवल आत्मनिर्भर इकाई नहीं था, बल्कि जाति, पेशा और सामाजिक वर्चस्व की जकड़न से भी भरा हुआ था। सदियों से दलित, शोषित और वंचित समुदायों ने पंचायतों के नाम पर स्थानीय उत्पीड़न झेला था। पंचायत, कई स्थानों पर न्याय का मंच नहीं, बल्कि परंपरागत प्रभुत्व का औजार रही थी।

डॉ. अंबेडकर ने इसी अनुभव के आधार पर गांव को “स्थानीय तानाशाही” की संज्ञा दी थी। उनका भय यह था कि यदि पंचायतों को बिना सामाजिक सुधार के संवैधानिक सत्ता दे दी गई, तो लोकतंत्र के नाम पर शोषण को वैधानिक स्वरूप मिल सकता है। यही वह बिंदु था जहां गांधी की नैतिक कल्पना और अंबेडकर की सामाजिक यथार्थवादी चिंता आमने-सामने खड़ी हो गईं। इस द्वंद्व का परिणाम यह हुआ कि संविधान में पंचायत को शासन की मूल इकाई के रूप में स्थान नहीं मिला। भारतीय संविधान ने पंचायतों का उल्लेख तो किया, लेकिन उन्हें बाध्यकारी संवैधानिक संस्था नहीं बनाया। संविधान के अनुच्छेद चालीस में राज्य को यह निर्देश दिया गया कि वह ग्राम पंचायतों का संगठन करे और उन्हें स्वशासन की इकाई के रूप में सक्षम बनाए। लेकिन यह अनुच्छेद राज्य नीति के निर्देशक तत्वों में रखा गया, जिसका अर्थ यह था कि यह न्यायालय में प्रवर्तनीय अधिकार नहीं, बल्कि नैतिक मार्गदर्शन मात्र था। पंचायत लोकतंत्र की आत्मा तो बनी, लेकिन उसकी रीढ़ नहीं।

इसके साथ ही संविधान की सातवीं अनुसूची में पंचायत को राज्य सूची में रखा गया। राज्य सूची की प्रविष्टि संख्या पांच में स्थानीय स्वशासन-नगरपालिकाएं, पंचायतें और अन्य स्थानीय निकाय-राज्यों के अधिकार क्षेत्र में सौंप दिए गए। इसका सीधा अर्थ यह था कि पंचायत राज को लागू करना या न करना राज्यों की राजनीतिक इच्छा पर निर्भर होगा। केंद्र ने स्वयं को इस जिम्मेदारी से अलग कर लिया। यही वह संवैधानिक व्यवस्था थी, जिसने पंचायत को राष्ट्रीय लोकतंत्र की प्राथमिकता बनने से रोक दिया।

परिणामस्वरूप, स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र ऊपर से नीचे की ओर चलता रहा। संसद और विधान सभाएं सत्ता के केंद्र बने रहे, जबकि पंचायतें हाशिए पर पड़ी रहीं। जब समय-समय पर पंचायत राज की मांग उठी, तब भी उसे गंभीरता से नहीं लिया गया। राजीव गांधी के कार्यकाल में चौसठवां संविधान संशोधन इस दिशा में पहला बड़ा प्रयास था, लेकिन राजनीतिक असहमति के कारण वह पारित नहीं हो सका। बाद में तिहत्तरवां और चौहत्तरवां संविधान संशोधन किए गए, जिनके माध्यम से पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया। इन संशोधनों के तहत संविधान में भाग नौ जोड़ा गया, अनुच्छेद दो सौ तैंतालीस से दो सौ तैंतालीस ओ तक पंचायतों की संरचना, चुनाव, आरक्षण और कार्यकाल की व्यवस्था की गई। कागज़ पर यह एक ऐतिहासिक कदम था, लेकिन व्यवहार में पंचायतों को न तो वित्तीय स्वतंत्रता मिली, न प्रशासनिक स्वायत्तता। ग्यारहवीं अनुसूची में विषय तो दिए गए, लेकिन उन पर वास्तविक नियंत्रण नौकरशाही और राज्य सरकारों के पास ही रहा।आज की पंचायत इसीलिए योजनाएं नहीं बनाती, बल्कि ऊपर से आई योजनाओं की सूची तैयार करती है। ग्रामसभा, जिसे संविधान में पंचायत की आत्मा माना गया, व्यवहार में औपचारिकता बनकर रह गई। पंचायत प्रतिनिधि जनता के प्रति नहीं, बल्कि पार्टी संगठन और प्रशासन के प्रति जवाबदेह होते चले गए। पंचायत चुनावों का पार्टीकरण इस स्थिति को और गहरा करता गया। जब पंचायत चुनाव चिन्ह और दल के नाम पर लड़े जाने लगे, तो गांव का प्रतिनिधि धीरे-धीरे राजनीतिक एजेंट में बदल गया।

इसी बीच विकास की नई परिभाषा सामने आई, जिसमें कॉरपोरेट हित, परियोजनाएं और निवेश प्राथमिक हो गए। पंचायतों की भूमिका कई बार जनता की आवाज बनने के बजाय, भूमि अधिग्रहण और परियोजना स्वीकृति की औपचारिक मुहर तक सीमित होती चली गई। यह वही बिंदु है जहाँ यह आशंका जन्म लेती है कि यदि पंचायत को वास्तविक स्वायत्तता नहीं मिली, तो वह लोकतंत्र की ढाल नहीं, बल्कि कॉरपोरेट सत्ता की सीढ़ी बनती चली जाएगी। पंचायत इसलिए आवश्यक है, क्योंकि लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार वोट डालने की प्रक्रिया नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है-रोजमर्रा के जीवन से जुड़े निर्णयों में जनता की सीधी भागीदारी। पंचायत लोकतंत्र का पहला स्कूल है, जहां नागरिक शासन करना सीखता है, केवल शासित होना नहीं। बिना मजबूत पंचायत के संसद और विधानसभाएं दूर की सत्ता बनकर रह जाती हैं। आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां लोकतंत्र का ढांचा तो मौजूद है, लेकिन उसकी आत्मा कमजोर होती जा रही है। ऊपर से नीचे तक फैली सत्ता संरचना, पार्टी आधारित राजनीति और कॉरपोरेट प्रभाव-ये सब मिलकर पंचायत राज को उसके मूल उद्देश्य से दूर ले गए हैं।

यदि पंचायत को वित्तीय अधिकार, प्रशासनिक स्वतंत्रता, ग्रामसभा की वास्तविक सर्वाेच्चता और पार्टी-मुक्त पहचान नहीं दी गई, तो स्वराज केवल इतिहास की किताबों में सिमटकर रह जाएगा।स्वराज का अर्थ सत्ता परिवर्तन नहीं, सत्ता की दिशा परिवर्तन है। जब तक यह दिशा नीचे से ऊपर की ओर नहीं बहती, तब तक भारत की लोकशाही अधूरी ही रहेगी-चाहे वह कितनी ही भव्य क्यों न दिखाई दे।

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