बिजनौरलेख

संत कबीर का संदेश: “ईश्वर एक है”

अंधविश्वास, पाखंड और धार्मिक विभाजन के विरुद्ध मानवता की आवाज़

लेखक: आर. एस. कोठारी, बिजनौर

भारतीय संत परंपरा में संत कबीरदास का नाम अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे ऐसे संत-कवि थे जिन्होंने अपने समय में व्याप्त अंधविश्वास, पाखंड, जातिगत भेदभाव, व्यक्ति-पूजा और धार्मिक कट्टरता का खुलकर विरोध किया। उनका मूल संदेश था—“ईश्वर एक है” तथा समस्त मानव जाति उसकी संतान है।

सामाजिक उथल-पुथल के दौर में कबीर का प्रादुर्भाव

कबीरदास का जन्म प्रचलित मान्यताओं के अनुसार सन् 1398 के आसपास काशी के लहरतारा क्षेत्र में हुआ माना जाता है। उनके जन्म के संबंध में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा नामक जुलाहा दंपत्ति ने किया था।

उस समय भारतीय समाज धार्मिक मतभेदों, कर्मकांडों और संप्रदायगत संघर्षों से जूझ रहा था। लोग मंदिरों और मस्जिदों में ईश्वर की खोज कर रहे थे, जबकि कबीर ने मानव के भीतर स्थित चेतना और सदाचार को ईश्वर तक पहुँचने का वास्तविक मार्ग बताया।

निर्गुण भक्ति के महान प्रवक्ता

कबीर हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की निर्गुण धारा के प्रमुख कवि और संत माने जाते हैं। उन्होंने ईश्वर को निराकार, सर्वव्यापी और सर्वमानव का समान हितैषी बताया। उनके अनुसार ईश्वर का न कोई आकार है, न रंग और न कोई विशेष रूप।

वे कहते थे कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए बाहरी आडंबरों की नहीं, बल्कि मन की पवित्रता, करुणा और सत्यनिष्ठा की आवश्यकता है।

मानवता और करुणा का संदेश

कबीरदास ने समाज को प्रेम, सहिष्णुता और परस्पर सम्मान का संदेश दिया। वे दुर्बलों के प्रति संवेदनशील रहने की प्रेरणा देते हुए कहते हैं—

 “दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय।

मरी खाल की साँस से, लोह भस्म हो जाय॥”

यह दोहा सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त संदेश देता है।

कर्मकांड और रूढ़ियों पर प्रहार

कबीर ने हिंदू और मुस्लिम दोनों समाजों में व्याप्त अंधविश्वासों तथा कर्मकांडों की आलोचना की। उनका उद्देश्य किसी धर्म का अपमान करना नहीं, बल्कि मनुष्य को आत्मचिंतन और सत्य की ओर प्रेरित करना था।

मस्जिदों में औपचारिक धार्मिक प्रदर्शन पर टिप्पणी करते हुए वे कहते हैं—

 “कांकर पाथर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय।

ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥”

इसी प्रकार मूर्तिपूजा के संदर्भ में उन्होंने कहा—

“दुनिया ऐसी बावरी, पाथर पूजन जाय।

घर की चाकी कोई न पूजे, जाका पीसा खाय॥”

इन दोहों का उद्देश्य समाज को विवेकपूर्ण चिंतन की ओर अग्रसर करना था।

शिक्षा नहीं, अनुभव था उनकी शक्ति

कबीर स्वयं स्वीकार करते हैं—

 “मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।”

यद्यपि उन्हें औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं थी, फिर भी उनके अनुभव, चिंतन और जीवन-दर्शन ने उन्हें भारतीय संत परंपरा का अद्वितीय व्यक्तित्व बना दिया।

वाणी में विनम्रता और जीवन में समानता

कबीर ने मधुर व्यवहार और विनम्र भाषा को मानव संबंधों की आधारशिला माना। उनका प्रसिद्ध दोहा आज भी उतना ही प्रासंगिक है—

 “ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥”

उन्होंने कभी किसी कार्य या व्यक्ति को छोटा-बड़ा नहीं माना और श्रम की गरिमा का सम्मान किया।

कबीर साहित्य की अमूल्य धरोहर

कबीर की वाणी को उनके अनुयायियों ने साखी, सबद और रमैनी के रूप में संकलित किया। उनकी अनेक रचनाएँ आज भी जनमानस को प्रेरित करती हैं। उनकी वाणी का महत्वपूर्ण भाग Guru Granth Sahib में भी संकलित है, जहाँ उन्हें अत्यंत सम्मान के साथ स्मरण किया जाता है।

मृत्यु और उससे जुड़ी लोककथाएँ

कबीरदास के अंतिम समय के संबंध में भी अनेक जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि उनके निधन के बाद हिंदू और मुस्लिम अनुयायियों के बीच अंतिम संस्कार की पद्धति को लेकर मतभेद उत्पन्न हुआ। किंवदंती के अनुसार जब चादर हटाई गई तो वहाँ शरीर के स्थान पर केवल पुष्प मिले। यद्यपि यह घटना ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है, किंतु यह कथा उनके जीवन से जुड़े आध्यात्मिक प्रभाव को दर्शाती है।

आज जब समाज विभिन्न प्रकार के वैचारिक, धार्मिक और सामाजिक तनावों का सामना कर रहा है, तब कबीर का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि मानवता, प्रेम, समानता और सत्य ही किसी भी सभ्य समाज की वास्तविक पहचान हैं।

यदि हम कबीर के विचारों को अपने जीवन में अपनाएँ, तो न केवल समाज में आपसी सद्भाव बढ़ सकता है, बल्कि विश्व स्तर पर भी शांति और भाईचारे की भावना को बल मिल सकता है।

संत कबीर ने अपने युग में जो मशाल जलाई थी, वह आज भी मानवता का मार्ग आलोकित कर रही है। उनका संदेश किसी एक धर्म, जाति या समुदाय के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए है। कबीर हमें याद दिलाते हैं कि ईश्वर की सच्ची उपासना मंदिरों, मस्जिदों या कर्मकांडों में नहीं, बल्कि मानवता, प्रेम और सदाचार में निहित है।

 “मत करो बात श्मशान की,

ना करो कब्रिस्तान की।

अचानक देख अनोखा मंजर,

जब बना शरीर फूलों की पहचान की।”

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