
नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने 12 सितंबर को ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ को सर्वसम्मति से स्वीकार किया। 45 पृष्ठ के इस घोषणापत्र में पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट, गाजा की मानवीय स्थिति, फिलिस्तीन, लेबनान, एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और बढ़ते व्यापारिक टैरिफ पर ब्रिक्स देशों ने साझा रुख सामने रखा। हालांकि दस्तावेज में इजराइल, अमेरिका या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का सीधे नाम लेकर आलोचना नहीं की गई है।
गाजा की मानवीय स्थिति पर गंभीर चिंता
घोषणापत्र में कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्रों, विशेषकर गाजा में मानवीय स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई। ब्रिक्स देशों ने अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और मानवाधिकार कानून के पालन पर जोर देते हुए नागरिकों तथा नागरिक ठिकानों को निशाना बनाने, स्वास्थ्य केंद्रों और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमलों तथा मानवीय सहायता में अवैध बाधाओं की निंदा की।
घोषणापत्र में युद्ध में भूख को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का भी विरोध किया गया। गाजा में मानवीय सहायता निर्बाध पहुंचाने तथा संघर्ष विराम कायम रखने की जरूरत बताई गई। साथ ही फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन का स्पष्ट विरोध किया गया। ब्रिक्स ने संयुक्त राष्ट्र की फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए राहत एवं कार्य एजेंसी (यूएनआरडब्ल्यूए) के समर्थन को भी दोहराया।
दो-राष्ट्र समाधान पर जोर
ब्रिक्स ने इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के स्थायी समाधान के लिए दो-राष्ट्र व्यवस्था के समर्थन को दोहराया। घोषणापत्र में 1967 से पहले की मान्य सीमाओं के आधार पर एक संप्रभु और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन तथा पूर्वी यरुशलम को उसकी राजधानी बनाए जाने की बात कही गई है।
दस्तावेज में फिलिस्तीन के संयुक्त राष्ट्र में पूर्ण सदस्यता के समर्थन की भी पुष्टि की गई। साथ ही फिलिस्तीनियों के आत्मनिर्णय और वापसी के अधिकार का उल्लेख किया गया है।
लेबनान और पश्चिम एशिया में तनाव घटाने की अपील
घोषणापत्र में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर गंभीर चिंता जताते हुए सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने तथा संवाद, परामर्श और कूटनीति के माध्यम से विवादों का समाधान करने की अपील की गई।
ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य तनाव की पृष्ठभूमि में ब्रिक्स का यह रुख खास महत्व रखता है। खास बात यह रही कि ब्रिक्स में ईरान के साथ संयुक्त अरब अमीरात भी सदस्य है, जिसके अमेरिका के साथ करीबी संबंध हैं। ऐसे परस्पर अलग रुख वाले देशों के बीच साझा भाषा पर सहमति बनाना सम्मेलन की महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौती थी।
एकतरफा प्रतिबंधों पर भी निशाना
घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के विपरीत लगाए जाने वाले एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों तथा अन्य दबावकारी उपायों का विरोध किया गया। ब्रिक्स ने कहा कि ऐसे प्रतिबंधों का व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और उनका सबसे अधिक असर गरीब तथा कमजोर वर्गों पर पड़ सकता है।
घोषणापत्र में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया, लेकिन यह रुख ऐसे समय आया है जब रूस और ईरान समेत कई ब्रिक्स सदस्य अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं।
टैरिफ नीति पर अमेरिका को परोक्ष संदेश
ब्रिक्स घोषणापत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या अमेरिका का नाम लेकर टैरिफ की आलोचना नहीं की गई। हालांकि सदस्य देशों ने एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों में बढ़ोतरी पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि ऐसे कदम वैश्विक व्यापार को प्रभावित करते हैं तथा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के अनुरूप नहीं हैं।
इस भाषा को मौजूदा अमेरिकी व्यापार और टैरिफ नीति पर परोक्ष संदेश के रूप में देखा जा रहा है। ब्रिक्स ने बहुपक्षीय और नियम आधारित व्यापार व्यवस्था को मजबूत करने तथा डब्ल्यूटीओ में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया।
भारत की कूटनीतिक रणनीति की परीक्षा
नई दिल्ली घोषणापत्र की भाषा भारत की संतुलित विदेश नीति को भी रेखांकित करती है। भारत के इजराइल के साथ रणनीतिक संबंध हैं, वहीं वह फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना और दो-राष्ट्र समाधान का भी लगातार समर्थन करता रहा है। दूसरी ओर रूस और ईरान के साथ भारत के महत्वपूर्ण रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध हैं तथा अमेरिका के साथ भी उसकी व्यापक साझेदारी है।
ऐसे में ब्रिक्स घोषणापत्र में किसी एक पक्ष को सीधे कठघरे में खड़ा करने के बजाय संवाद, कूटनीति, मानवीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय कानून पर जोर देना भारत के लिए सहमति कायम रखने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, पश्चिम एशिया पर ब्रिक्स में सहमति संवाद और कूटनीति के आधार पर बनी और यही रुख नई दिल्ली घोषणापत्र में दिखाई देता है।



