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यह समावेश का काल है, जिसमें भारतीय भाषाओं के बीच सामंजस्य स्थापित करना होगा: निगम 

- समावेशी साहित्य संस्थान ने “समावेशी साहित्य की सारगर्भिता” विषय पर आयोजित की आभासी संगोष्ठी

नजीबाबाद, राष्ट्रीय पंचायत। समावेशी साहित्य संस्थान के तत्वावधान में ‘समावेशी साहित्य की सारगर्भिता’ विषय पर रविवार, 1 अगस्त 2025 को देर शाम एक आभासी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता करते हुए डॉ. अखिलेश निगम ‘अखिल’ प्रसिद्ध साहित्यकार एवं पुलिस उपमहानिरीक्षक, उत्तर प्रदेश पुलिस ने कहा कि साहित्यिक गतिविधियों को देखते हुए वर्तमान काल का नाम ‘समावेशी काल’ उचित ही है। क्योंकि, इस काल में भेदभाव रहित साहित्य की प्रचुरता है। और, समावेशी साहित्य की अवधारणा में धार्मिक कट्टरता, जातियता, सांस्कृतिक विरोध, फूहड़ हास्य, चुटकुलेबाजी, अंधविश्वास या आतंकवाद को पोषित करने वाली सामग्री को कोई स्थान नहीं दिया जाएगा।

कार्यक्रम का प्रारंभ पत्रकार, साहित्यकार, संपादक एवं प्रकाशक डा. अमन कुमार त्यागी के स्वागत उद्बोधन के साथ हुआ। श्री त्यागी ने सभी विद्वानों का स्वागत करते हुए ‘समावेशी साहित्य की सारगर्भिता’ विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह एक ऐसा साहित्य है जिसमें सब होंगे और यह सबमें होगा। उन्होंने यह भी कहा कि “समावेशी की अवधारणा ही बिना किसी भेदभाव के अथवा बिना किसी विमशवाद के सभी का समावेश कर लेना है।” महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में जनसंचार विभाग के सहायक आचार्य डॉ. संदीप कुमार वर्मा मुख्य वक्ता रहे। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि साहित्य का व्यापक व्योम है। साहित्यक काल का वर्गीकरण विधाओं और विचारधारा के माध्यम से होता है और होता रहेगा। आज के संदर्भ में साहित्य का आदान-प्रदान काफी तेजी से हो रहा है। आज के सूचना और प्रौद्योगिकी दौर में साहित्य की विविध आयामों में एक क्रांति दिखाई देती है। श्री त्यागी ने कहा कि आज समावेशी साहित्य की परिस्थितियां नजर आ रही हैं। इस कालखण्ड को स्थापित करना समय की मांग बन गई है। लोक कार्य ही व्यापक विश्व कार्य होता है, इसलिए इस कालखण्ड का नाम ‘समावेशी काल’ उचित ही है।

उन्होंने यह भी कहा कि आज के इस काल में व्याकरण और व्यवसाय क्षेत्रीय भाषाओं में प्रवाहमान है जिससे इस कालखण्ड पर विशेष प्रभाव नजर आ रहा है। यह काल वास्तव में समावेश का ही काल है। समावेशी साहित्य काल में लोगों को आना ही होगा और समावेशी समाज का निर्माण करना होगा। अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. अखिलेश निगम ‘अखिल’ ने सभी उपस्थित विद्वानों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्यिक गतिविधियों को देखते हुए वर्तमान काल का नाम ‘समावेशी काल’ उचित ही है। क्योंकि, इस काल में भेदभाव रहित साहित्य की प्रचुरता है और समावेशी साहित्य की अवधारणा में धार्मिक कट्टरता, जातियता, सांस्कृतिक विरोध, फूहड़ हास्य, चुटकुलेबाजी, अंधविश्वास या आतंकवाद को पोषित करने वाली सामग्री को कोई स्थान नहीं दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह समावेश का काल है जिसमें भारतीय भाषाओं के बीच सामंजस्य स्थापित करना होगा।

कार्यक्रम के समापन से पहले आभासी श्रोताओं के लिए विशेष प्रश्नकाल का सत्र रखा गया। जिस दौरान अनेक विद्वानों/ साहित्यकारों/ भाषा चिंतकों ने अपने प्रश्न रखे और उनका जवाब भी मुख्य वक्ता द्वारा दिया गया। प्रसिद्ध साहित्यकार एवं अनुवादविद डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’ ने अंत में सभी का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। उमेश कुमार प्रजापति ‘अलख’ अनुवाद अधिकारी के संचालन में हुए कार्यक्रम में प्रो. हरिशंकर मिश्र, डॉ. ए. अच्युतन, डॉ. सी. जयशंकर बाबु, डॉ. दिनेश चन्द्र अवस्थी, डॉ. मोहन तिवारी आनन्द, कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ. राजीव रंजन प्रसाद, डॉ. एन. लक्ष्मी, डॉ. विजेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. मनोज कुमार सिंह, डॉ. अशोक कुमार, डॉ. सूर्य नारायण शूर (अधिवक्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय), डॉ. हरदीप कौर, डॉ रौबी फौजदार आदि की सारगर्भित उपस्थिति रही।

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