

सहारनपुर, 5 सितंबर। सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को प्रशासन ने शनिवार तड़के ध्वस्त कर दिया। कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर के सभी पांच गेट बंद कर दिए गए और किसी अनिधकृत व्यक्ति को प्रवेश नहीं दिया गया। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस और आरएएफ के जवान तैनात किये गये थे। प्रशासन की ओर से जेसीबी और अन्य मशीनों की मदद से मस्जिद के ढांचे को हटाया गया। यह प्रशासनिक कार्रवाई चार सितंबर को ज़िला जज की अदालत के उस फ़ैसले के बाद हुई, जिसमें मस्जिद प्रबंधन समिति की अपील ख़ारिज कर दी गई और पहले के उस फ़ैसले को बरकरार रखा गया।
स्थानीय मीडिया में शुक्रवार रात अचानक यह बात फैलने लगी थी कि कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को प्रशासन रात में ही गिराने जा रहा है। देखते ही देखते यह चर्चा शहर और सोशल मीडिया तक पहुंच गई। रात बढ़ने के साथ कलेक्ट्रेट परिसर के आसपास पुलिस बल की मौजूदगी भी बढ़ती गई। शनिवार तड़के क़रीब चार बजे से मस्जिद को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। सुबह तक मस्जिद का एक हिस्सा गिरा दिया गया था। पूरी इमारत को हटाने के लिए प्रशासन की ओर से छह बुलडोजर लगाए गए थे। इसके बाद कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर नेताओं और लोगों की उपस्थिति बढ़ गई।
इस मामले में सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह ने कहा, सहारनपुर कलेक्ट्रेट में एक मस्जिद थी, सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने पाया कि इसे सरकारी ज़मीन पर अवैध रूप से बनाया गया था. मस्जिद कमिटी की ओर से इसे गिराए जाने के खि़लाफ़ दायर अपील ख़ारिज कर दी गई।’
उन्होंने कहा, ‘क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हमने सभी एहतियाती क़दम उठाए हैं, यह कार्रवाई करते हुए हम सभी क़ानूनी प्रक्रियाओं का पालन कर रहे हैं।’ डीआईजी ने बताया कि सहारनपुर में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है और सोशल मीडिया पर भी नज़र रखी जा रही है। उन्होंने कहा कि इस मामले में कोई भी अफ़वाह फैलाने पर कार्रवाई की जाएगी।
दूसरी ओर मस्जिद गिराने से पहले, समाजवादी पार्टी की लोकसभा सांसद इक़रा हसन को कैराना स्थित उनके आवास पर नज़रबंद कर दिया गया, ताकि उन्हें सहारनपुर जाने से रोका जा सके. इक़रा हसन ने एक्स पर एक वीडियो शोयर किया है, जिसमें उन्हें पुलिसकर्मी जाने से रोक रहे हैं।
‘मस्जिद नहीं तोड़ी गई है, वहां संविधान की धज्जियां उड़ाई गई हैं।’-मसूद
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का कहना है कि लोगों को उनके घरों में कैद करके मस्जिद गिरा दी गई। इमरान मसूद ने कहा, ‘हमारे लोग पूरी रात जागते रहे। हम अधिकारियों से लगातार संपर्क करने की कोशिश करते रहे। सारी जानकारी देने के बावजूद मस्जिद तोड़ दी गई। दरअसल मस्जिद नहीं तोड़ी गई है, वहां संविधान की धज्जियां उड़ाई गई हैं।’
उन्होंने कहा, ‘यह मस्जिद सन 1911 से भी पहले की है। आज भी मस्जिद की मिल्कियत वहिद ख़ान और याक़ूब ख़ान के नाम है। सारी जानकारी देने के बाद भी सिटी मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया। इमरान मसूद ने आरोप लगाया, ‘मस्जिद को चारों तरफ से घेर लिया गया। लोगों को उनके घरों में क़ैद कर दिया गया. इसके बाद मस्जिद गिरा दी गई।
दूसरी ओर मुजफ्फरनगर के कैराना से समाजवादी पार्टी की लोकसभा सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकने के लिए उनके आवास पर नजरबंद किया गया। उन्होंने सोशल मीडिया पर पुलिसकर्मियों द्वारा उन्हें बाहर जाने से रोकने का वीडियो साझा किया।
मस्जिद विवाद में कैसे आई?
मस्जिद पर शनिवार को हुई कार्रवाई के पीछे क़रीब डेढ़ साल से चल रहा कानूनी विवाद है। जिला जज सत्येंद्र कुमार की अदालत ने दो सितंबर 2026 को मस्जिद पक्ष की ओर से दाखिल अपील ख़ारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह के 16 जुलाई 2026 के आदेश को बरकरार रखा था।
ज़िला अदालत ने विवादित भूमि को सरकारी भूमि माना. मस्जिद पक्ष ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देते हुए 20 जुलाई को अपील दाखिल की थी और अदालत में कुल 17 तारीख़ों पर सुनवाई हुई। सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने जुलाई में मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण मानते हुए बेदखली का आदेश दिया था। आदेश में 30 दिन में परिसर ख़ाली करने के निर्देश के साथ 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये की क्षतिपूर्ति भी निर्धारित की गई थी। मस्जिद पक्ष की ओर से अदालत में इसे वक़्फ संपत्ति बताते हुए दलील दी गई थी। पक्ष ने मस्जिद के करीब 150 वर्ष पुरानी होने का दावा भी किया था, लेकिन अदालत में इस दावे के समर्थन में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके।
कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को लेकर विवाद की शुरुआत बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की शिकायत से हुई थी। इसके बाद 24 मार्च 2025 को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में उत्तर प्रदेश लोक परिसर अधिनियम के तहत मामला दाखिल हुआ था। लंबी सुनवाई के बाद 16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट ने मस्जिद को अवैध घोषित करते हुए बेदखली और ध्वस्तीकरण का आदेश दिया था।
मस्जिद पक्ष ने इस आदेश को ज़िला अदालत में चुनौती दी। क़रीब डेढ़ महीने की सुनवाई के बाद ज़िला जज की अदालत ने दो सितंबर को अपील ख़ारिज कर दी और सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। 5 सितंबर शनिवार तड़के सुबह शुरू हुई ध्वस्तीकरण की कार्रवाई ने इस पूरे विवाद को एक बार फिर शहर के केंद्र में ला दिया है।
मस्जिद गिराए जाने पर राजनीतिक प्रतिक्रिया
हैदराबाद से लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने एक्स पर लिखा, ‘सहारनपुर कलेक्ट्रेट में मौजूद मस्जिद को आज सुबह पाँच बजे ढहा दिया गया। क्या मुसलमानों के लिए अब मज़हबी आज़ादी का संवैधानिक हक़ भी नहीं बचा है? हमारी इबादतगाहों पर बार-बार कमज़ोर और मनगढ़ंत वजहों के नाम पर बुलडोज़र क्यों चलाया जाता है? मस्जिद कमिटी ने 1911 के दस्तावेज़ अदालत में पेश करके यह साबित करने की कोशिश की कि यह मस्जिद कलेक्ट्रेट से पहले से मौजूद थी। एक सदी से भी ज्यादा वक्त से वहाँ लगातार नमाज़ होती रही है। यानी यह कोई आज खड़ी कर दी गई इमारत नहीं है, बल्कि लंबे अरसे से एक इबादतगाह के तौर पर इस्तेमाल होती रही है। यही वक्फ़ बाय यूज़र की बुनियाद है, जिसे क़ानून में भी मान्यता मिली है।’
दूसरों की आस्था का सम्मान करने वाला ही सच्चा सनातनी-अखिलेश यादव
सहारनपुर में मस्जिद के ध्वस्तीकरण को लेकर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि जो लोग दूसरे धर्मों का सम्मान नहीं करते, वे सच्चे सनातनी नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि दूसरों की आस्था से खिलवाड़ करना सनातन धर्म की भावना के विपरीत है। अखिलेश ने कहा कि सच्चा हिंदू कभी दूसरों का अपमान नहीं करता। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन धर्म हमें पूरी धरती और समाज को एक परिवार मानने की सीख देता है।
बहुजन समाज पार्टी की मुखिया एवं प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने मस्जिद गिराने पर लिखा, ‘ज़िला सहारनपुर की मस्जिद सहित पूरे उत्तर प्रदेश में आए दिन मस्जिदों को काफ़ी आपाधापी में अवैध बताकर उनको ध्वस्त करने का जो सरकारी अभियान चल रहा है वह ठीक नहीं है। सरकार को ऐसे निगेटिव हालात से बचने के लिए इस पर तुरंत रोक लगाकर इसके समाधान के अन्य उपाय ज़रूर करने चाहिए।’