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भारत की प्रथम महिला शिक्षिका माता सावित्रीबाई फुले : शिक्षा, समता और संघर्ष की अमर गाथा

भारतीय सामाजिक इतिहास में तीन जनवरी 1848 का दिन एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है। इस दिन अपने पति, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत और राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले के अथक संघर्ष के बाद माता सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं के लिए देश का पहला विद्यालय खोलकर इतिहास रच दिया। इसी विद्यालय में सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं।

उन्हें देश के पहले किसान स्कूल की संस्थापक होने का श्रेय भी प्राप्त है। किसानों के अधिकारों और हितों के लिए कानून बनवाने हेतु फुले दंपति ने संगठित और निरंतर संघर्ष किया।

उन्नीसवीं सदी में महिलाओं की दयनीय स्थिति

उन्नीसवीं सदी का भारत महिलाओं के लिए अत्यंत कठिन दौर था। पुरुषवादी वर्चस्व, सामाजिक रूढ़ियों और अमानवीय परंपराओं ने महिलाओं के आत्मगौरव और स्वाभिमान को पूरी तरह कुचल दिया था।

विशेषकर शोषित, वंचित और अस्पृश्य समाज की महिलाएं नारकीय जीवन जीने को विवश थीं। ऐसी विषम परिस्थितियों में माता सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं को सामाजिक शोषण से मुक्ति का मार्ग दिखाया और शिक्षा को उनका सबसे बड़ा हथियार बनाया।

महिला मुक्ति आंदोलन की अग्रदूत

राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिबा फुले को आदर्श मानकर संपूर्ण जीवन महिला मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया।

उन्होंने सतीप्रथा, बाल विवाह, विधवा उत्पीड़न और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष किया तथा विशेष रूप से वंचित वर्ग की महिलाओं के उत्थान के लिए कार्य किया।

बाल हत्या प्रतिबंधक गृह और विधवा विवाह की पहल

28 जनवरी 1848 को सावित्रीबाई फुले ने दुष्कर्म पीड़ित गर्भवती महिलाओं के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की।

उन्होंने विधवा विवाह की परंपरा को भी सामाजिक स्वीकृति दिलाने का ऐतिहासिक कार्य किया, जो उस समय एक साहसिक और क्रांतिकारी कदम था।

प्रेरणास्रोत बनी मराठी की आदि कवयित्री

मराठी की इस आदि कवयित्री की रचनाएं आज भी विश्वभर की स्त्रियों को प्रेरणा देती हैं-

> “जाओ जाकर पढ़ो, लिखो, बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती,

काम करो—ज्ञान और धन इकट्ठा करो।

ज्ञान के बिना सब खो जाता है,

ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते हैं।

इसलिए खाली न बैठो,

जाओ जाकर शिक्षा लो,

सीखने का यह सुनहरा मौका है,

सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो।”

जन्म, परिवार और प्रारंभिक जीवन

महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में माली जाति में 3 जनवरी 1831 को जन्मी सावित्रीबाई फुले के पिता का नाम खंदोजी नैवेसे और माता का नाम लक्ष्मी था।

वे न केवल भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं, बल्कि नारी मुक्ति आंदोलन की प्रथम नेता, समाज सुधारक और महान कवयित्री भी थीं।

नौ वर्ष की आयु में विवाह

सावित्रीबाई का विवाह मात्र नौ वर्ष की आयु में वर्ष 1840 में ज्योतिराव फुले से हुआ। विवाह के समय वे पढ़ी-लिखी नहीं थीं, किंतु सीखने की तीव्र लगन के कारण उनके पति ने उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया।

बाद में उन्होंने अहमदनगर और पुणे में शिक्षण प्रशिक्षण प्राप्त कर एक कुशल शिक्षिका के रूप में पहचान बनाई।

नौ छात्राओं से शुरू हुआ पहला बालिका विद्यालय

3 जनवरी 1848 को पुणे में सावित्रीबाई फुले और महात्मा फुले ने विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय स्थापित किया।

एक वर्ष के भीतर ही दोनों ने पांच नए विद्यालय खोलकर महिला शिक्षा की क्रांति को गति दी। तत्कालीन सरकार ने उनके इस कार्य के लिए उन्हें सम्मानित भी किया।

पत्थर, गंदगी और अपमान—फिर भी अडिग

बालिकाओं को पढ़ाने के कारण समाज के ठेकेदारों ने उन पर पत्थर फेंके, गंदगी डाली। वे अपने थैले में एक अतिरिक्त साड़ी रखती थीं और स्कूल पहुंचकर गंदी साड़ी बदल लेती थीं।

इसके बावजूद उन्होंने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया।

विधवाओं और दलितों के लिए आश्रय और समानता

1854 में उन्होंने विधवाओं के लिए आश्रय गृह खोला, जिसे 1864 में एक बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया।

अतिशूद्रों के लिए पानी की समस्या को देखते हुए फुले दंपति ने सार्वजनिक कुआं खुदवाया, ताकि समानता का व्यवहार संस्थापित किया।

अंतिम संघर्ष और अमर बलिदान

1890 में महात्मा ज्योतिबा फुले के निधन के बाद सावित्रीबाई फुले ने स्वयं उनका अंतिम संस्कार कर सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी।

1897 में महाराष्ट्र में फैले प्लेग के दौरान उन्होंने एक अछूत बच्चे को बचाते हुए स्वयं बीमारी की शिकार होकर 10 मार्च 1897 को अंतिम सांस ली।

माता सावित्रीबाई फुले शिक्षा, समता, ममता और सामाजिक न्याय की सजीव प्रतिमूर्ति थीं। उनका जीवन आज भी शोषित, वंचित और विशेषकर महिलाओं के लिए प्रेरणा का अमर स्रोत है।

— शिवशंकर

जिला सचिव, वाराणसी

बहुजन समाज पार्टी, उत्तर प्रदेश

जय भीम! | नमो बुद्धाय।

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