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अर्थव्यवस्था में जनकल्याण और सामाजिक न्याय को मिले प्राथमिकता: डॉ. एस. मुंडाली

दलित-आदिवासी समाज की आर्थिक उन्नति के लिए कार्ल मार्क्स, एडम स्मिथ और डॉ. जितेन्द्र पासवान के विचारों के समन्वय पर दिया जोर

भुवनेश्वर/ओडिशा। दलित इंडस्ट्रीज एसोसिएश़न ऑफ ओडिशा से जुड़े डॉ. एस. मुंडाली ने भारतीय अर्थव्यवस्था, सामाजिक न्याय और वंचित समुदायों की आर्थिक उन्नति को लेकर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि देश की आर्थिक नीतियों का उद्देश्य केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में वृद्धि तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि आम नागरिकों की आय, रोजगार, जीवन स्तर और आर्थिक सुरक्षा में सुधार भी होना चाहिए।

उन्होंने आर्थिक नीतियों के निर्माण में जनकल्याण, सामाजिक समानता और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मानना है कि किसी भी देश की वास्तविक आर्थिक प्रगति का आकलन इस आधार पर भी किया जाना चाहिए कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंच रहा है।

आर्थिक विकास में नागरिकों के हित सर्वोपरि हों

डॉ. मुंडाली के अनुसार, भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में आर्थिक विकास की चर्चा करते समय GDP के साथ-साथ प्रति व्यक्ति आय, रोजगार के अवसर, छोटे उद्यमों की स्थिति और गरीब परिवारों की आर्थिक क्षमता पर भी ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आर्थिक नीतियों में बड़े उद्योगों और पूंजी निवेश के साथ छोटे व्यापारियों, किसानों, कारीगरों, श्रमिकों तथा सामाजिक रूप से वंचित समुदायों के हितों का संतुलन बनाए रखना चाहिए।

उन्होंने आर्थिक व्यवस्था में व्यापारिक गतिविधियों की भूमिका को स्वीकार करते हुए यह भी कहा कि बाजार व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें उपभोक्ताओं, उत्पादकों और श्रमिकों के अधिकार सुरक्षित रहें। व्यापार और उद्योग का उद्देश्य केवल लाभ अर्जित करना नहीं, बल्कि रोजगार सृजन, उत्पादन वृद्धि और सामाजिक विकास में योगदान देना भी होना चाहिए।

प्रकृति और संस्कृति से मिलती है संतुलित विकास की प्रेरणा

डॉ. मुंडाली ने चीन की ऐतिहासिक सामाजिक और आर्थिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए प्रकृति के साथ संतुलन तथा सामाजिक उत्तरदायित्व को महत्वपूर्ण बताया। उनके विचार में प्रकृति के संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, अनावश्यक उपभोग पर नियंत्रण और समाज के प्रति जिम्मेदारी किसी भी टिकाऊ विकास मॉडल के आवश्यक आधार हैं।

उन्होंने संस्कृति के संदर्भ में बड़ों के सम्मान, शिक्षा, सामाजिक अनुशासन और सत्ता में बैठे लोगों की जवाबदेही जैसे विषयों पर भी ध्यान आकर्षित किया। उनका कहना है कि शासन और प्रशासन की सफलता इस बात से तय होती है कि वह कमजोर, गरीब और अधिकारों से वंचित लोगों के हितों की रक्षा किस सीमा तक करता है।

स्वच्छता और श्रम को मिले समान सम्मान

डॉ. मुंडाली ने स्वच्छता तथा श्रम की गरिमा को सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य को छोटा या बड़ा मानने के बजाय प्रत्येक श्रमिक के योगदान का सम्मान किया जाना चाहिए। सफाई, स्वच्छता और सार्वजनिक स्थानों के रखरखाव की जिम्मेदारी केवल किसी एक समुदाय पर डालना उचित नहीं है।

उन्होंने सामाजिक भेदभाव और जाति आधारित पेशागत असमानताओं को समाप्त करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि स्वच्छता को केवल धार्मिक या पारंपरिक अवधारणाओं तक सीमित रखने के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नागरिक जिम्मेदारी और मानवीय गरिमा से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

उनके अनुसार, समानता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए प्रत्येक व्यक्ति को श्रम का सम्मान करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी समुदाय के साथ उसके जन्म, जाति या पारंपरिक व्यवसाय के आधार पर भेदभाव न हो।

सामाजिक न्याय और आर्थिक चिंतन का समन्वय जरूरी

डॉ. मुंडाली ने डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक समानता और आर्थिक न्याय के बिना लोकतांत्रिक व्यवस्था के उद्देश्यों को पूरी तरह प्राप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने दलित और आदिवासी समुदायों की आर्थिक उन्नति के लिए शिक्षा, उद्यमिता, कौशल विकास, पूंजी तक पहुंच और रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया।

उन्होंने डॉ. जितेन्द्र पासवान के आर्थिक विचारों और कार्यशैली का उल्लेख करते हुए उन्हें वंचित समुदायों की आर्थिक प्रगति के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। उनके विचार में डॉ. पासवान के आर्थिक दृष्टिकोण का अध्ययन व्यापक स्तर पर होना चाहिए, ताकि उसके उपयोगी पहलुओं को समाज की जरूरतों के अनुरूप समझा और अपनाया जा सके।

मार्क्स, एडम स्मिथ और भारतीय सामाजिक चिंतन से सीखने की जरूरत

डॉ. मुंडाली का सुझाव है कि दलित और आदिवासी समुदायों की आर्थिक उन्नति के लिए कार्ल मार्क्स, एडम स्मिथ और डॉ. जितेन्द्र पासवान के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाना चाहिए।

कार्ल मार्क्स के चिंतन से श्रमिकों के अधिकार, आर्थिक असमानता और उत्पादन संबंधों को समझने में मदद मिल सकती है। वहीं एडम स्मिथ के विचार श्रम विभाजन, उत्पादन, बाजार और आर्थिक गतिविधियों की भूमिका को समझने का अवसर प्रदान करते हैं। इसके साथ ही डॉ. जितेन्द्र पासवान के आर्थिक विचारों का अध्ययन वंचित समुदायों की व्यावहारिक समस्याओं और आर्थिक सशक्तीकरण की संभावनाओं के संदर्भ में किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि किसी एक आर्थिक विचारधारा को पूर्ण समाधान मानने के बजाय विभिन्न विचारों के उपयोगी पक्षों को अपनाते हुए ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जो उद्यमिता को प्रोत्साहित करे, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करे और आर्थिक अवसरों में समानता सुनिश्चित करे।

आर्थिक सशक्तीकरण ही सामाजिक परिवर्तन की मजबूत नींव

डॉ. एस. मुंडाली के विचारों का मूल संदेश है कि भारत की आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचना चाहिए। इसके लिए सरकार, उद्योग जगत, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा।

दलित, आदिवासी और अन्य वंचित समुदायों को केवल रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें उद्यम स्थापित करने, उत्पादन के साधनों तक पहुंच बनाने, बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने और आर्थिक निर्णयों में भागीदारी करने के अवसर भी मिलने चाहिए।

उन्होंने आर्थिक नीतियों में सामाजिक उत्तरदायित्व, पारदर्शिता और समान अवसरों को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके अनुसार, एक समृद्ध राष्ट्र वही है, जहां आर्थिक विकास के साथ नागरिकों की गरिमा, श्रम का सम्मान और सामाजिक न्याय भी सुनिश्चित हो।

स्रोत एवं विचार: डॉ. एस. मुंडाली, दलित इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ ओडिशा द्वारा व्यक्त विचारों पर आधारित।

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