देहूरोड में बुद्धमूर्ति स्थापना : आधुनिक भारत में धम्मक्रांति की आधारशिला

विशेष लेख | 25 दिसंबर 1954 | पुणे (महाराष्ट्र)
25 दिसंबर 1954 भारतीय सामाजिक-धार्मिक इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि है। इसी दिन पुणे जिले के देहूरोड में भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने जिस बुद्धमूर्ति की विधिवत स्थापना की, वह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि वह आधुनिक भारत में बौद्ध धम्म के पुनर्जागरण और धम्मक्रांति की ऐतिहासिक शुरुआत सिद्ध हुई।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सन् 1952 में रंगून (वर्तमान यांगून, म्यांमार) में आयोजित विश्व बौद्ध धम्म सम्मेलन में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को प्रमुख अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विश्वभर के बौद्ध विद्वान, भिक्षु और प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे। सम्मेलन के दौरान वहाँ के राजा द्वारा डॉ. आंबेडकर को एक पवित्र बुद्धमूर्ति भेंट की गई।
यही वही बुद्धमूर्ति है, जिसे बाबासाहेब ने भारत लाकर 25 दिसंबर 1954 को देहूरोड स्थित एक छोटे से बुद्ध विहार में विधिवत प्रतिष्ठित किया।
देश की पहली बुद्धमूर्ति प्रतिष्ठापना
यह तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि यह मूर्ति-प्रतिष्ठा 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में हुई ऐतिहासिक धम्मदीक्षा से पूरे दो वर्ष पूर्व सम्पन्न हुई थी। इस कारण देहूरोड की बुद्धमूर्ति को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा स्थापित देश की पहली बुद्धमूर्ति माना जाता है।
देहूरोड में उस समय एक छोटी वास्तु (बुद्ध विहार) तो मौजूद थी, किंतु उसमें बुद्धमूर्ति स्थापित नहीं थी। बाबासाहेब ने उसी विहार को धम्म का केंद्र बनाते हुए इस मूर्ति की प्रतिष्ठापना की।
ऐतिहासिक भाषण और भविष्यदृष्टि
बुद्धमूर्ति स्थापना के अवसर पर दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था—
“आज का यह प्रसंग इतिहास में दर्ज किया जाएगा। बारह सौ वर्षों के बाद पहली बार बुद्ध की मूर्ति स्थापित करने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ है। इसका समस्त श्रेय हमें ही जाता है, इसलिए हमें स्वयं को धन्य मानना चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा—
“यहीं से इतिहास रचा जाएगा और यहीं से बहुजन समाज को बौद्ध धम्म का मार्ग प्राप्त होगा।”
बाबासाहेब के ये शब्द आगे चलकर अक्षरशः सत्य सिद्ध हुए।
धम्मक्रांति का उद्गम स्थल
देहूरोड का यह छोटा सा बुद्ध विहार आगे चलकर धम्मक्रांति का एक महत्वपूर्ण प्रेरणा-स्थल बन गया। यहीं से सामाजिक समानता, आत्मसम्मान, करुणा और प्रज्ञा पर आधारित बौद्ध धम्म का संदेश जन-जन तक पहुँचा। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि ने 1956 की ऐतिहासिक धम्मदीक्षा का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके माध्यम से करोड़ों लोगों ने बौद्ध धम्म अपनाया।
समकालीन प्रासंगिकता
आज जब भारतीय समाज समता, बंधुता और न्याय के मूल्यों की पुनः तलाश कर रहा है, तब देहूरोड में स्थापित यह बुद्धमूर्ति हमें डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की दूरदर्शिता और सामाजिक प्रतिबद्धता की याद दिलाती है। यह स्थल केवल एक धार्मिक स्मारक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और मानव गरिमा का प्रतीक है।
25 दिसंबर 1954 को देहूरोड में हुई बुद्धमूर्ति की स्थापना भारतीय इतिहास की उन घटनाओं में से एक है, जिसने देश की सामाजिक दिशा को गहराई से प्रभावित किया। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का यह कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
इस महान ऐतिहासिक योगदान के लिए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को कोटि-कोटि नमन।
— राकेश गजभिये


